Chhattisgarh High Court Sharia Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानूनन अदालत नहीं है। ऐसी संस्था किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति तय नहीं कर सकती। उसके आदेश के आधार पर विवाह भी कानूनी रूप से समाप्त नहीं माना जा सकता।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ ने रायपुर स्थित इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट के 18 जनवरी 2022 के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया। इस आदेश में महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि यह आदेश किसी वैधानिक न्यायिक प्रक्रिया के तहत पारित नहीं हुआ था। इसलिए इसका महिला की वैवाहिक स्थिति या कानूनी अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
पति-पत्नी के विवाद से शुरू हुआ मामला
मामला रायपुर के टिकरापारा निवासी 38 वर्षीय निरोश अब्बासी से जुड़ा है। उनके पहले पति की 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उन्होंने 18 जुलाई 2020 को मोहम्मद आबिद खान से निकाह किया। शादी के बाद बच्चों और नए पारिवारिक माहौल को लेकर दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगा। महिला के मुताबिक, विवाद के बाद पति ने तलाक की प्रक्रिया शुरू की। वहीं पति का दावा था कि उसने तलाक-ए-हसन के तहत 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को अलग-अलग मौकों पर तलाक घोषित किया था।
महिला ने दर्ज कराई थी FIR
महिला ने पति और ससुराल पक्ष पर प्रताड़ना, क्रूरता और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए। विवाद सुलझाने के लिए वन स्टॉप सखी सेंटर में काउंसिलिंग भी हुई, लेकिन दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद महिला ने 7 अक्टूबर 2021 को पुलिस अधीक्षक के सामने शिकायत दी। शिकायत के आधार पर 1 नवंबर 2021 को महिला थाना रायपुर में पति सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 498-A और 34 के तहत FIR दर्ज की गई।
निजी शरिया संस्था ने महिला को बताया था तलाकशुदा
इसी विवाद के बीच रायपुर स्थित इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट ने 18 जनवरी 2022 को एक आदेश जारी किया। इसमें महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया गया था। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने इस आदेश के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया। हाईकोर्ट ने कहा कि निजी धार्मिक संस्थाओं को राज्य द्वारा स्थापित अदालतों जैसे न्यायिक अधिकार हासिल नहीं हैं।
धार्मिक राय और कानूनी फैसला अलग
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली निजी धार्मिक संस्थाएं धार्मिक मान्यताओं के आधार पर राय दे सकती हैं। लेकिन ऐसी राय किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति, अधिकार या जिम्मेदारियों को अपने आप नहीं बदल सकती। किसी विवाह को कानूनी रूप से समाप्त करने या वैवाहिक अधिकारों पर फैसला देने का अधिकार कानून के तहत सक्षम न्यायालय या संबंधित वैधानिक प्राधिकारी के पास ही है।
तलाक-ए-हसन की वैधता पर कोर्ट ने नहीं दिया फैसला
हाईकोर्ट ने इस मामले में तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि उसके फैसले का महिला की ओर से दर्ज FIR या उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। आपराधिक मामले और दूसरे कानूनी अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर संबंधित सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार फैसला करेंगे।
याचिका आंशिक रूप से स्वीकार
हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट के 18 जनवरी 2022 के आदेश को कानूनी अधिकार के बिना जारी किया गया आदेश माना। इस फैसले से हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी निजी धार्मिक संस्था का आदेश अपने आप किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति या कानूनी अधिकारों में बदलाव नहीं कर सकता।


