Digital Postal Index Number: अगर किसी को अपना पूरा पता बताने के बजाय सिर्फ एक डिजिटल कोड दिया जाए और उसी से आपकी लोकेशन की पहचान हो जाए, तो यह कैसा रहेगा? भारत में डाक और एड्रेसिंग सिस्टम को डिजिटल बनाने की दिशा में DIGIPIN इसी तरह की व्यवस्था तैयार कर रहा है। भारतीय डाक की इस पहल में किसी स्थान को एक यूनिक डिजिटल कोड के जरिए पहचाना जा सकेगा। खास बात यह है कि इसके इस्तेमाल के लिए इंटरनेट जरूरी नहीं होगा।
हालांकि DIGIPIN मौजूदा छह अंकों वाले PIN Code या पारंपरिक पते को खत्म करने के लिए नहीं बनाया गया है। इसका मकसद किसी लोकेशन की पहचान को ज्यादा सटीक और डिजिटल बनाना है। इसका इस्तेमाल डाक और पार्सल डिलीवरी के साथ ई-कॉमर्स, सरकारी सेवाओं और इमरजेंसी रिस्पॉन्स जैसी सेवाओं में किया जा सकता है।
क्या है DIGIPIN?
DIGIPIN का पूरा नाम Digital Postal Index Number है। यह एक जियो-स्पेशियल डिजिटल एड्रेसिंग सिस्टम है, जिसके जरिए देश के हर स्थान को एक विशिष्ट कोड से पहचानने की व्यवस्था बनाई गई है। यह मौजूदा PIN Code से अलग है। PIN Code किसी बड़े भौगोलिक क्षेत्र की पहचान करता है, जबकि DIGIPIN किसी खास लोकेशन को ज्यादा सटीक तरीके से डिजिटल रूप में पहचानने के लिए तैयार किया गया है। यानी भविष्य में पारंपरिक पते के साथ DIGIPIN का इस्तेमाल किसी जगह की डिजिटल पहचान के लिए किया जा सकता है।
6 अंकों वाले PIN Code से कितना अलग?
भारत में मौजूदा PIN Code व्यवस्था 1972 में शुरू हुई थी। छह अंकों का PIN Code आज भी देश की डाक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। लेकिन एक PIN Code के दायरे में कई घर, दुकानें, कार्यालय और दूसरी जगहें आती हैं। इसलिए सिर्फ PIN Code के आधार पर किसी व्यक्ति की सटीक लोकेशन पहचानना संभव नहीं होता। ऐसे में मकान नंबर, गली, मोहल्ला और लैंडमार्क जैसी अतिरिक्त जानकारी की जरूरत पड़ती है। DIGIPIN इसी लोकेशन पहचान को ज्यादा सटीक बनाने की दिशा में काम करता है।
4 मीटर की ग्रिड में होगी लोकेशन की पहचान
DIGIPIN की सबसे अहम विशेषता इसका जियो-स्पेशियल ग्रिड सिस्टम है। इसके तहत देश के क्षेत्र को छोटे-छोटे ग्रिड में बांटकर लोकेशन के लिए यूनिक कोड तैयार किया जाता है। इससे किसी स्थान की डिजिटल पहचान ज्यादा सटीक तरीके से की जा सकती है। ऐसे इलाकों में इसका फायदा ज्यादा हो सकता है, जहां पारंपरिक पते के जरिए किसी जगह तक पहुंचना मुश्किल होता है।
पहाड़ और दूरदराज इलाकों में ज्यादा फायदा
देश के कई ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में घरों के स्पष्ट सड़क पते या मकान नंबर नहीं होते। ऐसे में डाक और डिलीवरी करने वालों को स्थानीय लोगों, लैंडमार्क और आसपास की भौगोलिक जानकारी की मदद लेनी पड़ती है। DIGIPIN जैसी डिजिटल लोकेशन व्यवस्था ऐसे क्षेत्रों में किसी जगह की पहचान आसान बनाने में मदद कर सकती है।
IIT हैदराबाद और ISRO की विशेषज्ञता
DIGIPIN को विकसित करने में IIT हैदराबाद और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO से जुड़े नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) की तकनीकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल किया गया है। सैटेलाइट और जियो-स्पेशियल डेटा की मदद से तैयार यह सिस्टम भारत में डिजिटल एड्रेसिंग को मजबूत करने की दिशा में एक पहल है।
क्या अब चिट्ठी-पार्सल पर पता लिखने की जरूरत नहीं होगी?
नहीं। DIGIPIN को पारंपरिक डाक पते का तत्काल विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। सिर्फ DIGIPIN डालने से हर चिट्ठी या पार्सल अपने आप घर तक पहुंच जाएगा, ऐसा कहना सही नहीं होगा। फिलहाल इसका उद्देश्य डिजिटल एड्रेसिंग के जरिए किसी स्थान की सटीक पहचान उपलब्ध कराना है। भविष्य में डिलीवरी एजेंसियां और अलग-अलग डिजिटल सेवाएं इसे अपनाती हैं, तो लोकेशन की पहचान और सर्विस डिलीवरी में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
सरकारी और इमरजेंसी सेवाओं में भी इस्तेमाल
DIGIPIN का संभावित इस्तेमाल सिर्फ डाक विभाग तक सीमित नहीं है। बैंकिंग, बीमा, ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक्स, सरकारी सेवाओं और इमरजेंसी रिस्पॉन्स जैसी सेवाओं में भी डिजिटल एड्रेसिंग का फायदा मिल सकता है। किसी व्यक्ति या संस्थान की लोकेशन को डिजिटल तरीके से पहचानने की सुविधा से अलग-अलग सेवाओं के बीच एड्रेस डेटा साझा करना और किसी स्थान तक पहुंचना आसान हो सकता है।
डिजिटल एड्रेसिंग की ओर बड़ा कदम
तेजी से बढ़ती डिजिटल सेवाओं के बीच सटीक एड्रेसिंग सिस्टम की जरूरत भी बढ़ रही है। DIGIPIN पारंपरिक पते और जियो-स्पेशियल तकनीक के बीच एक डिजिटल कड़ी तैयार करने की दिशा में कदम है। अगर आने वाले समय में ज्यादा डिलीवरी और डिजिटल सर्विस प्लेटफॉर्म इसे अपनाते हैं, तो उन इलाकों में इसका खास फायदा हो सकता है जहां पारंपरिक पते से सटीक लोकेशन बताना मुश्किल होता है।


