Agriculture Tips: धान की फसल अब पकने की ओर है, लेकिन खेतों में माहू का प्रकोप किसानों की चिंता बढ़ा रहा है। राजनांदगांव क्षेत्र के ग्राम खपरी के किसानों का कहना है कि 20 से 30 दिन तक असर का दावा करने वाली महंगी कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करने के कुछ दिन बाद ही माहू फिर दिखाई देने लगा।
कई किसानों ने तीन से चार बार दवा का छिड़काव किया है, इसके बावजूद नियंत्रण नहीं होने से अब फसल के साथ बढ़ते खर्च की चिंता भी सताने लगी है। कुछ किसानों ने दवा कंपनियों के खिलाफ उपभोक्ता फोरम जाने की तैयारी की बात कही है।
माहू क्या है और धान को कैसे नुकसान पहुंचाता है?
माहू धान की फसल में लगने वाला एक चूसक कीट है। यह पौधे से रस चूसता है। प्रकोप बढ़ने पर पौधे कमजोर होने लगते हैं और फसल को नुकसान पहुंच सकता है। खेत में माहू की मौजूदगी को समय रहते पहचानना जरूरी है, क्योंकि शुरुआती स्तर पर नियंत्रण के उपाय ज्यादा प्रभावी रहते हैं। किसानों के लिए यह समझना भी जरूरी है कि माहू कोई बीमारी नहीं, बल्कि कीट है। इसके प्रकोप के कारण धान के पौधों में नुकसान के लक्षण दिखाई देते हैं।
धान में माहू क्यों बढ़ता है?
माहू का प्रकोप सिर्फ दवा से जुड़ा मामला नहीं है। खेत का वातावरण, फसल की स्थिति और पोषक तत्वों का संतुलन भी इसकी स्थिति को प्रभावित करता है। खासकर खेत में नाइट्रोजन की अधिकता और बहुत घनी फसल होने पर माहू के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं। इसलिए किसान केवल माहू दिखाई देने के बाद दवा डालने पर निर्भर न रहें। खेत की देखभाल और निगरानी भी जरूरी है। पौधों के निचले हिस्से और तने की जांच करते रहने से शुरुआती प्रकोप का पता लगाया जा सकता है।
माहू दिखे तो किसान क्या करें?
सबसे पहले खेत में कीट की सही पहचान कराना जरूरी है। बिना पहचान के बार-बार अलग-अलग दवाओं का छिड़काव करने से किसान का खर्च बढ़ सकता है। खेत में पानी का प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है। भूरा माहू के प्रकोप की स्थिति में प्रभावित खेत से पानी की निकासी करने की सलाह दी जाती है। नाइट्रोजन खाद का इस्तेमाल भी संतुलित मात्रा में करना चाहिए। अगर कीट का प्रकोप ज्यादा है तो किसान स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही अनुशंसित कीटनाशक का इस्तेमाल करें। दवा की मात्रा और छिड़काव का सही समय भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
एक एकड़ में माहू की दवा पर दो हजार से ज्यादा खर्च
ग्राम खपरी के किसान मुरारजी साहू ने बताया कि माहू के नियंत्रण के लिए उन्होंने दो बार लंबी अवधि वाली ब्रांडेड दवाओं का छिड़काव किया। सिर्फ माहू की दवा पर ही प्रति एकड़ दो हजार रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि तनाछेदक और शीथ ब्लाइट के नियंत्रण के लिए भी दवाओं पर अलग से खर्च करना पड़ा। इसके बावजूद खेत में माहू और तनाछेदक का प्रकोप दिखाई दे रहा है। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है कि फसल तैयार होने से पहले ही लागत लगातार बढ़ती जा रही है।
10-12 एकड़ में डेढ़ लाख से ज्यादा खर्च
किसान गिरधर साहू के मुताबिक उन्होंने 10 से 12 एकड़ में खेती की है और अब तक कीटनाशकों पर डेढ़ लाख रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। माहू को नियंत्रित करने के लिए तीन बार छिड़काव करने के बाद भी समस्या बनी हुई है। अब चौथी बार दवा डालने की तैयारी है। उनके अनुसार करीब पांच एकड़ फसल माहू से प्रभावित हुई है। उन्होंने सांभा और स्वर्णा किस्म के धान में माहू का प्रकोप ज्यादा होने की बात कही। किसान अजीत कुमार ने भी कई बार दवा का छिड़काव करने के बावजूद माहू पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होने की बात कही है।
बार-बार दवा डालने से पहले किसान रखें ये सावधानी
माहू दोबारा दिखाई देने पर तुरंत एक और दवा डाल देना ही समाधान नहीं है। पहले यह देखना जरूरी है कि खेत में कौन-सा कीट है और उसका प्रकोप कितने स्तर पर है। इसके बाद कृषि विशेषज्ञ की सलाह से ही दवा का चयन करना चाहिए।किसानों का कहना है कि जब महंगी दवाओं पर कंपनियां लंबे समय तक असर का दावा करती हैं और कुछ ही दिनों में कीट दोबारा दिखाई देने लगता है, तो इसकी जांच होनी चाहिए। यही वजह है कि कुछ किसान संबंधित दवा कंपनियों के खिलाफ उपभोक्ता फोरम जाने की तैयारी की बात कह रहे हैं।



