Chhattisgarh Apple Farming: छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जशपुर जिले में सेब की खेती किसानों के लिए आय का नया जरिया बनकर उभर रही है। मनोरा और बगीचा विकासखंड के शैला, छतौरी, करडना और छिछली गांवों में करीब 410 आदिवासी किसान 410 एकड़ जमीन पर सेब के पेड़ लगा चुके हैं। अब इन बगीचों में फल आने लगे हैं और किसान बेहतर कमाई की उम्मीद कर रहे हैं।
जशपुर में सेब की खेती को बढ़ावा देने की पहल वर्ष 2023 में जिला प्रशासन, ग्रामीण विकास एवं विकास सोसायटी और नाबार्ड के संयुक्त प्रयासों से शुरू हुई थी। उस समय किसानों को सेब के पौधे, तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया गया। अधिकांश किसानों ने शुरुआत में एक-एक एकड़ जमीन पर बगीचे तैयार किए थे। तीन साल बाद पेड़ों पर फल आने से इस प्रयोग को लेकर किसानों का भरोसा बढ़ा है।
कश्मीर और हिमाचल जैसे स्वाद का दावा
ग्रामीण विकास एवं विकास सोसायटी के अध्यक्ष राजेश गुप्ता के मुताबिक, किसानों को पौधे लगाने से लेकर कलम चढ़ाने, सिंचाई और पेड़ों की देखभाल तक का प्रशिक्षण दिया गया। किसानों का दावा है कि उनके बगीचों में तैयार सेब का स्वाद और गुणवत्ता कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश के सेब जैसी है। स्थानीय मंडियों के अलावा दूसरे जिलों के व्यापारी भी इन सेबों में रुचि दिखा रहे हैं।
जशपुर का मौसम सेब की खेती के अनुकूल
जशपुर की ऊंचाई, पहाड़ी भूभाग और ठंडा मौसम सेब की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराते हैं। हालांकि, यहां के किसान लंबे समय से मुख्य रूप से धान की खेती पर निर्भर रहे हैं। इसी निर्भरता को कम करने और आय के नए विकल्प तैयार करने के लिए बागवानी को बढ़ावा दिया गया। मौजूदा बगीचों में फल आने से जिले में फसल विविधीकरण की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।
धान के मुकाबले ज्यादा निवेश, कमाई की नई उम्मीद
सेब की खेती में पौधों की देखभाल, सिंचाई, खाद और कीट-रोग नियंत्रण पर खर्च करना पड़ता है। इसके बावजूद फल आने के बाद बेहतर बाजार मूल्य मिलने की संभावना किसानों को आकर्षित कर रही है। आसपास के बगीचों में पेड़ों पर फल देखकर दूसरे किसान भी इस खेती में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। हालांकि, वास्तविक मुनाफा उत्पादन, गुणवत्ता, बाजार भाव और परिवहन लागत पर निर्भर करेगा।
बगीचों की निगरानी कर किसानों को दिया जा रहा प्रशिक्षण
ग्रामीण विकास एवं विकास सोसायटी की टीम समय-समय पर किसानों के बगीचों का दौरा करती है। इस दौरान कीट-रोग नियंत्रण, खाद-पानी के प्रबंधन और पेड़ों की कटाई-छंटाई के बारे में सलाह दी जाती है। नियमित देखभाल से आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है। शुरुआती नतीजे उत्साहजनक रहने पर इस मॉडल को जिले के दूसरे पहाड़ी इलाकों में भी विस्तार देने की योजना है।
दूसरे विकासखंडों तक विस्तार की तैयारी
जिला प्रशासन का उद्देश्य सेब की खेती के जरिए आदिवासी परिवारों के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत तैयार करना है। आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ने पर सेब की बिक्री और विपणन के लिए अलग व्यवस्था विकसित करने पर भी जोर दिया जा सकता है। यदि किसानों को स्थायी बाजार और उचित कीमत मिलती है, तो जशपुर में सेब की खेती पारंपरिक कृषि के साथ एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है।



