बिलासपुर। भूविस्थापितों के हित के लिए गठित भूमि अधिग्रहण प्राधिकरण, छत्तीसगढ़ में सरकारी उपेक्षा का शिकार है। इस प्राधिकरण में बीते 20 महीने से पीठासीन अधिकारी का पद रिक्त है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए आदेश जारी कर दिया था। इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है।

भूअर्जन के मामलों की होती है सुनवाई

मालूम हो कि छत्तीसगढ़ सरकार ने भूमि अर्जन, पुनर्वासन, और पुनर्व्यवस्थापन से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए राज्य स्तरीय भूमि अर्जन पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण (सीजी बीएचएआर) गठित किया है। इसके पीठासीन अधिकारी सेवानिवृत जिला न्यायाधीश या उनके समकक्ष किसी न्यायिक अधिकारी को नियुक्त किया जाता है। मगर यह पद सितंबर 2023 से खाली है।

यह प्राधिकरण, भूमि अर्जन, पुनर्वासन, और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 51 के तहत काम करता है। अगर किसी हितबद्ध व्यक्ति को कलेक्टर द्वारा भू-अर्जन के संबंध में पारित अधिनिर्णय से असंतोष है, तो वह अपना मामला प्राधिकरण के पास भेज सकता है। प्राधिकरण, आवेदक से जुड़े मामले को सुनवाई के लिए कलेक्टर को सूचित करता है। सुनवाई के बाद, प्राधिकरण मामले का निपटारा करेगा।

See also  एमसीबी में 29 तो बलौदाबाजार-भाटापारा में 28 पुलिसकर्मियों का ट्रांसफर

भूअर्जन के लिए 75% ग्रामीणों की सहमति अनिवार्य

औद्योगीकरण, अनिवार्य अवसंचरचनात्मक सूविधाओं के विकास, और नगरीकरण के लिए भूमि का अर्जन करने के मामलों में प्रभावित परिवारों को रोज़गार की व्यवस्था की जाती है। भू-अर्जन के लिए 2013 में पारित नए कानून के तहत 75 प्रतिशत विस्थापित हो रहे किसानों की सहमति अनिवार्य है। पीठासीन अधिकारी पर इसकी निगरानी का भी दायित्व है।

पूर्व में जनहित याचिका हो चुकी है खारिज

इस संबंध में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ही जून 2024 को बाबूलाल की जनहित याचिका निजी स्वार्थ से प्रेरित होने का कारण बताते हुए खारिज कर दी गई थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर कर दलील दी कि कई याचिकाओं के बाद प्राधिकरण में पीठासीन अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश जारी किए गए, लेकिन राज्य सरकार ने कार्रवाई नहीं की, जिससे हजारों भूमि अधिग्रहण आवेदक अपने अधिकारों से वंचित हो गए। मुआवजे की राशि अभी भी लंबित है।

See also  निर्भया केस : दोषियों को हाईकोर्ट से झटका, कोर्ट ने कहा-चारों दोषियों को एक साथ फांसी दी जाए, दोषियों को मिली 7 दिन की मोहलत

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि नए कानून के तहत छत्तीसगढ़ में भूमि अधिग्रहण प्राधिकरण के लिए पिछले 10 महीनों से पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति का निर्देश दिया था, जिसका पालन नहीं हुआ। अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक अन्य याचिकाकर्ता लक्ष्मीचंद के प्रकरण में सुनवाई हुई है। 22 जनवरी को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से इस संबंध में जवाब मांगा था। 30 जनवरी को हाईकोर्ट में राज्य सरकार ने जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। हाईकोर्ट ने तब 3 सप्ताह बाद प्रकरण की सुनवाई करना तय किया और शासन को समय दिया। अब इस मामले में हाईकोर्ट में शीघ्र सुनवाई हो सकती है।