टीआरपी। Rewa excavations : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम रीवां (रीवांगढ़) में चल रहे पुरातात्विक उत्खनन ने प्रदेश के प्राचीन इतिहास को लेकर नई और महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है। उत्खनन से इस बात का सबूत मिला है कि इस क्षेत्र के आसपास मानव सभ्यता का विकास ईसा पूर्व 800 वर्ष पहले से हो चुका था।

“छत्तीसगढ़ के प्राचीन सिक्के एवं मुद्रा प्रणाली” विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि रीवां उत्खनन के परिणाम उत्साहजनक हैं। यहां कल्चुरी कालीन सिक्के प्राप्त हुए हैं। हालिया उत्खनन में प्राप्त लौह प्रगलन केंद्र तथा रेडियोकार्बन तिथि निर्धारण के आधार पर रीवां की प्राचीनता 9 वीं सदी ईसा पूर्व (उत्तर वैदिक काल) तक निर्धारित की गई है, जो छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास और तकनीकी परंपरा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। छत्तीसगढ़ की धरती एक अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और गौरवशाली सभ्यता की साक्षी रही है। हमारी संस्कृति और इतिहास की जड़ें अत्यंत गहरी हैं, जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टि से उजागर करना हम सभी का दायित्व है। यह खोज छत्तीसगढ़ की प्राचीन तकनीकी दक्षता, आर्थिक व्यवस्था और सांस्कृतिक निरंतरता को सशक्त रूप से प्रमाणित करती है।

संस्कृति विभाग के पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय द्वारा कराए जा रहे इस उत्खनन में वैज्ञानिक ए.एम.एस. रेडियोकार्बन (कार्बन-14) डेटिंग के माध्यम से यह प्रमाणित हुआ है कि इस क्षेत्र में मानव सभ्यता उत्तर वैदिक काल यानी 800 ईसा पूर्व से भी पहले विकसित हो चुकी थी।

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लोरिक-चंदा की लोककथा प्रचलित

रीवां का यह प्राचीन स्थल कोलहान नाला और बंधवा तालाब के बीच स्थित है। स्थानीय जनमानस में यहां लोरिक-चंदा की लोककथा पीढ़ियों से प्रचलित रही है। क्षेत्र की विशिष्ट भौगोलिक बनावट के कारण इसे मृत्तिकागढ़ या मडफोर्ट भी कहा जाता है। चंडी मंदिर के समीप लगभग 75 एकड़ में फैले मृत्तिकागढ़, उसके चारों ओर खाई और परकोटे के अवशेष आज भी इसकी प्राचीनता के साक्ष्य देते हैं।

1975 में मिले थे 35 स्वर्ण सिक्के

इस क्षेत्र में पहले भी ऐतिहासिक सामग्री मिलने के संकेत मिले थे। वर्ष 1975 में 35 स्वर्ण सिक्के प्राप्त हुए थे, जबकि नेशनल हाईवे के किनारे स्थित एक बड़े टीले को इतिहासकारों ने स्तूप होने की संभावना से जोड़ा था। इन्हीं तथ्यों के आधार पर वर्ष 2019 में व्यवस्थित उत्खनन शुरू किया गया। वर्तमान में यह कार्य संचालनालय के उप संचालक डॉ. पी.सी. पारख के निर्देशन और डॉ. वृषोत्तम साहू के सह-निर्देशन में किया जा रहा है। दो प्रमुख टीलों पर लगभग 7 मीटर गहराई तक खुदाई में विभिन्न कालों के सांस्कृतिक स्तर सामने आए हैं।

काल निर्धारण की जटिलता को सुलझाने के लिए उत्खननकर्ताओं ने अलग-अलग सांस्कृतिक स्तरों से चारकोल के तीन सैंपल लेकर अमेरिका की फ्लोरिडा स्थित विश्व प्रसिद्ध और आएसओ प्रमाणित प्रयोगशाला बीटा एनालिटिक्स भेजे। रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

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पहला सैंपल – 650 – 543 ईसा पूर्व, बुद्ध के समकालीन महाजनपद काल

दूसरा सैंपल – 806 – 748 ईसा पूर्व, बुद्ध के जन्म से लगभग 200 वर्ष पूर्व (उत्तर वैदिक/लौह युग)

तीसरा सैंपल – 541 – 392 ईसा पूर्व, महाजनपद से मौर्य काल तक

इन निष्कर्षों से यह स्पष्ट हुआ कि छत्तीसगढ़ में उत्तर वैदिक काल में ही लौह युगीन संस्कृति विकसित हो चुकी थी और यहां मानव बसावट की निरंतरता सदियों तक बनी रही।

अनेक शासनकाल के सिक्के


उत्खनन में मौर्य, शुंग, सातवाहन, शक-क्षत्रप, कुषाण और स्थानीय शासकों के सिक्के मिले हैं, जो प्राचीन व्यापारिक गतिविधियों की पुष्टि करते हैं। हाल ही में यहां से 2606 ताम्र सिक्कों की एक विशाल मुद्रा निधि प्राप्त हुई है, जिससे रीवां भारत के उन चुनिंदा स्थलों में शामिल हो गया है, जहां सर्वाधिक सिक्का निधि मिली है। ये सिक्के पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच प्रचलित गज-देवी प्रकार के स्थानीय ताम्र सिक्के हैं।

लोहे के उपकरण बनते थे

इसके साथ ही, उत्खनन में लोहे के उपकरण बनाने की कार्यशाला के भी साक्ष्य मिले हैं, जो छत्तीसगढ़ के पुरातात्विक इतिहास में पहली बार दर्ज किए गए हैं। पुरातत्वविदों के अनुसार, 800 से 400 ईसा पूर्व के बीच रीवां में सुदृढ़ मानव बस्ती थी, जिसकी निरंतरता लगभग 700 ईस्वी तक रही। इस आधार पर रीवां की तुलना देश के प्राचीन नगरों जैसे कौशांबी और अहिछत्र से की जा सकती है।

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अनेक स्थलों की खुदाई

विशेषज्ञों का मानना है कि यह उत्खनन न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि मध्य भारत के लौह युगीन सांस्कृतिक इतिहास को समझने में एक मील का पत्थर साबित होगा। रेडियोकार्बन परीक्षण से तैयार होने वाली यह कालक्रमिक रूपरेखा भविष्य में होने वाले अन्य उत्खननों के लिए भी मार्गदर्शक बनेगी। रीवांगढ़ क्षेत्र में और विस्तृत खुदाई कराई जाएगी। छत्तीसगढ़ पुरातत्व विभाग द्वारा रींवागढ़ के अलावा अब तक गढ़धनौरा, पचराही, ताला, भोंगापाल, सिरपुर महेशपुर, पचराही, तरीघाट, डमरू, मदकूद्धीप, राजिम, देवरी, जमराव आदि स्थलो पर खुदाई कराई जा चुकी है।

संगोष्ठी में वरिष्ठ इतिहासकार आचार्य रमेंद्र नाथ मिश्र, जी. एल. रायकवार, मुद्राशास्त्री डॉ. जी. एस. ख्वाजा (नागपुर), प्रो. सुष्मिता बसु मजूमदार (कोलकाता), प्रो. आलोक श्रोतरीय (अमरकंटक), डॉ. देवेन्द्र कुमार सिंह (अमरकंटक), डॉ. विशि उपाध्याय (पटना) तथा डॉ. राजीव मिंज, पुरातत्व विभाग के उप संचालक डा.पीसी पारख, प्रभात कुमार सिंह, न्यूमिस्मेटिक एंड फिलेटली सोसाइटी ऑफ छत्तीसगढ़ के पदाधिकारी कमल बैद, रीवा के सरपंच घसिया राम साहू सहित अन्य जनप्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

रिपोर्टर श्रवण शर्मा 28 वर्षों से पत्रकारिता जगत में कार्यरत हैं। पूर्व में लगभग 7 वर्षो तक दिल्ली के प्रतिष्ठित अखबारों में पत्रकार के रूप में कार्य किया। इसके पश्चात विगत 21 वर्षों से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कार्यरत हैं। दैनिक जागरण ग्रुप के नईदुनिया संस्थान में 17 वर्ष तक कार्य किया। वर्तमान में टीआरपी न्यूज में गत वर्ष से कार्य कर रहे हैं।
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