रायपुर। कलिंगा विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय ने 5 से 12 अक्टूबर 2026 तक “टीचर इनोवेशन चैलेंज: लर्न, क्रिएट एंड टीच” (Teacher Innovation Challenge: Learn, Create & Teach) शीर्षक से सात दिवसीय ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यक्रम ने शिक्षकों और भावी शिक्षकों को एक साथ लाकर शिक्षण के नवीन, तकनीक-सक्षम और शिक्षार्थी-केंद्रित दृष्टिकोणों की खोज की।
यह सात दिवसीय ऑनलाइन कार्यक्रम एआई (AI) सक्षम शिक्षण, डिजिटल शिक्षाशास्त्र (digital pedagogy), समावेशी कक्षाएं और योग्यता-आधारित मूल्यांकन की खोज के लिए विभिन्न प्रतिभागियों और विशेषज्ञ विषय-विशेषज्ञों को एक मंच पर लाया।
एमओयू (MoU) साझेदारों के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला को इंटरैक्टिव, व्यावहारिक (hands-on) चुनौतियों के माध्यम से पारंपरिक व्याख्यान-आधारित शिक्षण पद्धति से आगे बढ़ने के लिए डिज़ाइन किया गया था। प्रत्येक सत्र ने प्रतिभागियों को कक्षा की व्यावहारिक स्थितियों को हल करने, शिक्षण संसाधन विकसित करने और नवीन शैक्षणिक दृष्टिकोण प्रदर्शित करने के लिए प्रोत्साहित किया। कार्यशाला की रिपोर्ट के अनुसार, सभी पंजीकृत प्रतिभागियों ने भाग लिया और इस कार्यक्रम से संकाय (फैकल्टी) के छह सदस्य जुड़े हुए थे।
कार्यशाला में विभिन्न क्षेत्रों के शैक्षणिक संस्थानों से आए विशेषज्ञ विषय-विशेषज्ञों के नेतृत्व में सात विषयगत (thematic) सत्र आयोजित किए गए। इनमें शिक्षण प्रदर्शन (teaching demonstrations), गतिविधि-आधारित शिक्षण, डिजिटल संसाधनों का निर्माण, समावेशी कक्षा प्रबंधन, मूल्यांकन रणनीतियाँ, व्यावसायिक आत्म-चिंतन और व्यावहारिक शैक्षणिक नवाचार जैसे विषय शामिल थे।

सत्रवार विवरण:-
•5 अक्टूबर:- कार्यक्रम की शुरुआत दीवान वीएस इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के डॉ. विकास भारद्वाज द्वारा संचालित “एआई टीचिंग विजार्ड चैलेंज” (AI Teaching Wizard Challenge) के साथ हुई। इस सत्र में सूक्ष्म प्रदर्शनों (micro-demonstrations) और सहकर्मी मूल्यांकन (peer evaluations) के माध्यम से व्यावहारिक शिक्षाशास्त्र पर जोर दिया गया।
•6 अक्टूबर:- इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय, मीरपुर के डॉ. बिजेंद्र सिंह ने “टीच विदाउट ए टेक्स्टबुक” (Teach Without a Textbook) शीर्षक से एक सत्र का नेतृत्व किया। उन्होंने प्रदर्शित किया कि शिक्षक कक्षा में सीखने की प्रक्रिया को अधिक गतिशील और सुलभ बनाने के लिए कहानी सुनाने, खेल, थिएटर और दैनिक जीवन की वस्तुओं का उपयोग कैसे कर सकते हैं।
•7 अक्टूबर:- तीसरा सत्र—”टीच इन फाइव मिनट्स!” (Teach in Five Minutes!)—डॉ. ज्योति दुबे (सहायक प्राध्यापक, देवसंस्कृति कॉलेज ऑफ एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी) द्वारा संचालित किया गया। इस सत्र में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि डिजिटल उपकरण पाठ डिज़ाइन, दृश्य सामग्री (visual aids) निर्माण और प्रश्नोत्तरी (quizzes) तथा वर्कशीट के तेजी से निर्माण को कैसे गति दे सकते हैं।
•8 अक्टूबर:- व्यावहारिक ध्यान को जारी रखते हुए, डॉ. स्वाति श्रीवास्तव (प्राचार्य, सांदीपनि अकादमी, दुर्ग) ने “क्लासरूम क्राइसिस: यू आर द टीचर!” (Classroom Crisis: You Are the Teacher!) नामक एक इंटरैक्टिव कार्यशाला का नेतृत्व किया। इसमें रोल-प्ले और वास्तविक समय में समस्याओं को हल करने का उपयोग किया गया, ताकि शिक्षकों को चुनौतीपूर्ण कक्षा परिदृश्यों से निपटने के लिए समावेशी और अनुकूलन योग्य रणनीतियाँ विकसित करने में मदद मिल सके।
•9 अक्टूबर:- पांचवां सत्र—”द असेसमेंट डिटेक्टिव” (The Assessment Detective)—डॉ. संध्या द्विवेदी (महात्मा गांधी बालिका विद्यालय (पीजी) कॉलेज, फिरोजाबाद) के नेतृत्व में हुआ। यह सत्र पारंपरिक मूल्यांकन विधियों को नया रूप देने पर केंद्रित था, जिसमें शिक्षकों को स्थिर (static) प्रश्नों को गतिशील प्रश्नोत्तरी, वास्तविक जीवन की समस्या परिदृश्यों, पहेलियों और योग्यता-आधारित मूल्यांकनों में बदलना सिखाया गया।
•10 अक्टूबर:- डॉ. अरुण कुमार दुबे (प्राचार्य, कोलंबिया कॉलेज, रायपुर) ने “द टीचर सुपरपावर चैलेंज” (The Teacher Superpower Challenge) का संचालन किया। यह एक इस सत्र में प्रतिभागियों ने इंटरैक्टिव आत्म-परिचय, रचनात्मक अभ्यासों और एक व्यक्तिगत “टीचर विजन कार्ड” तैयार करके अपनी व्यक्तिगत शिक्षण क्षमताओं की खोज की।
•12 अक्टूबर:- कार्यशाला का समापन सेंट थॉमस कॉलेज, भिलाई की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीलम गांधी के नेतृत्व में “द एजुकेशन इनोवेशन एक्सपो” (The Education Innovation Expo) के साथ हुआ। यह सत्र कम लागत वाली और पुनर्चक्रण योग्य (reusable) सामग्रियों का उपयोग करके व्यावहारिक शिक्षण नवाचारों को प्रस्तुत करने पर केंद्रित था, जिसने शैक्षिक अभ्यास में रचनात्मकता, पहुंच और संसाधनशीलता के महत्व को रेखांकित किया।
आयोजन समिति:-
यह कार्यक्रम सहायक प्राध्यापक डॉ. हर्षा शर्मा के नेतृत्व में आयोजित किया गया था, जिन्होंने आयोजन सचिव के रूप में कार्य किया। डॉ. सरोज नायर ने समन्वयक (coordinator) के रूप में कार्य किया, जबकि डॉ. डी. कालिदास, डॉ. संजीव कुमार यादव और डॉ. इमैनुएल हंस ने सह-समन्वयक (co-coordinators) के रूप में सेवाएं दीं। प्रीतम कुमार पटेल तकनीकी समन्वयक थे। इस कार्यक्रम का मार्गदर्शन शिक्षा संकाय की अधिष्ठाता (Dean) प्रो. डॉ. श्रद्धा वर्मा द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया था।
संस्थान का दृष्टिकोण:-
“यह कार्यशाला संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों—विशेष रूप से SDG 4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा), SDG 9 (उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचा), SDG 10 (अमानताओं में कमी), और SDG 17 (लक्ष्यों के लिए साझेदारी) के प्रति शिक्षा संकाय की अटूट प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। शिक्षक प्रशिक्षण में समावेशी शिक्षाशास्त्र, अत्याधुनिक डिजिटल संसाधनों और अंतर-संस्थगत सहयोग को शामिल करके, कलिंगा विश्वविद्यालय लचीले, आधुनिक और न्यायसंगत शैक्षिक पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में अग्रणी बना हुआ है।
व्यावहारिक चुनौतियों को सहकर्मी शिक्षण और शिक्षण प्रदर्शनों के साथ एकीकृत करके, इस पहल का उद्देश्य शिक्षकों को अपने नवीन विचारों को कक्षा के अभ्यास में बदलने के लिए प्रोत्साहित करना था। इस कार्यक्रम ने शिक्षार्थियों की उभरती जरूरतों का उत्तर देने में सक्षम चिंतनशील, अनुकूलनशील और साधन संपन्न शिक्षकों को तैयार करने में शिक्षक शिक्षा की भूमिका को रेखांकित किया।



