Bombay Blood Group: जयपुर में डायबिटीज से जूझ रहे एक व्यक्ति की मौत के बाद दुर्लभ बॉम्बे ब्लड ग्रुप चर्चा में है। मिली जानकारी के अनुसार, मरीज का हीमोग्लोबिन काफी कम था और उन्हें खून चढ़ाने की जरूरत थी।
जांच में उनका ब्लड ग्रुप बॉम्बे फीनोटाइप निकला। उनकी बेटी का ब्लड ग्रुप भी यही था और उन्होंने एक यूनिट रक्तदान किया, लेकिन मरीज को जितनी जरूरत थी उतना खून नहीं मिल पाया। मंगलवार रात जयपुर के एक निजी अस्पताल में मरीज की मौत हो गई।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप क्या होता है?
आमतौर पर लोग A पॉजिटिव, B पॉजिटिव, AB पॉजिटिव और O पॉजिटिव जैसे ब्लड ग्रुप के बारे में जानते हैं। लेकिन बॉम्बे ब्लड ग्रुप इनसे अलग होता है। इसे मेडिकल भाषा में Bombay phenotype या Oh (hh) phenotype कहा जाता है। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन (NCBI) के अनुसार, भारत में यह ब्लड ग्रुप औसतन हर 10 हजार लोगों में लगभग एक व्यक्ति में पाया जाता है। यूरोप में इसकी मौजूदगी करीब 10 लाख लोगों में एक बताई गई है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और आबादी में इसकी दर अलग हो सकती है।
O नेगेटिव भी क्यों नहीं चढ़ाया जा सकता?
बॉम्बे ब्लड ग्रुप की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे सामान्य O ब्लड ग्रुप नहीं माना जा सकता। इसकी वजह खून में मौजूद एक खास संरचना है, जिसे H एंटीजन कहते हैं। आमतौर पर H एंटीजन की मदद से लाल रक्त कोशिकाओं पर A या B एंटीजन बनते हैं। O ब्लड ग्रुप में A और B एंटीजन नहीं होते, लेकिन H एंटीजन मौजूद रहता है। इसके उलट, बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति की लाल रक्त कोशिकाओं पर H एंटीजन नहीं होता। इसी कारण उनकी कोशिकाओं पर A और B एंटीजन भी नहीं बन पाते।
इस ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति के रक्त में anti-H सहित ऐसी एंटीबॉडी हो सकती हैं, जो सामान्य रक्त की लाल रक्त कोशिकाओं पर प्रतिक्रिया करती हैं। इसलिए सामान्य O ग्रुप का खून भी उनके लिए गंभीर और जानलेवा ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन का कारण बन सकता है। ऐसे मरीजों को आमतौर पर उसी बॉम्बे फीनोटाइप वाले डोनर का रक्त चाहिए, जिसकी अन्य जरूरी रक्त-संगतताएं भी जांच में सही पाई जाएं।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप की पहचान कैसे होती है?
सामान्य ब्लड ग्रुप जांच में बॉम्बे फीनोटाइप कई बार O ग्रुप जैसा दिखाई दे सकता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लाल रक्त कोशिकाओं पर A और B एंटीजन नहीं मिलते। लेकिन केवल इस आधार पर इसे O ग्रुप घोषित करना सही नहीं है। इसकी पहचान के लिए आगे की इम्यूनोहेमेटोलॉजी जांच की जरूरत पड़ सकती है। इसमें रक्त के दोनों प्रकार के ग्रुपिंग टेस्ट, एंटी-H से जुड़ी जांच और जरूरत के मुताबिक अन्य पुष्टिकरण जांच की जाती हैं। सही पहचान इसलिए अहम है, क्योंकि गलत रक्त चढ़ाने से गंभीर प्रतिक्रिया हो सकती है।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप की खोज कब हुई थी?
बॉम्बे ब्लड ग्रुप की पहचान वर्ष 1952 में मुंबई में हुई थी। डॉ. वाई. एम. भेंडे और उनकी टीम ने ऐसे रक्त की पहचान की, जिसकी लाल रक्त कोशिकाओं पर सामान्य ABO ब्लड ग्रुप से जुड़े एंटीजन और H एंटीजन मौजूद नहीं थे। उस समय मुंबई को बॉम्बे कहा जाता था। इसी शहर के नाम पर इस दुर्लभ रक्त समूह को बॉम्बे ब्लड ग्रुप नाम मिला।
क्या बॉम्बे ब्लड ग्रुप कोई बीमारी है?
बॉम्बे ब्लड ग्रुप होना अपने आप में कोई बीमारी नहीं है। इस ब्लड ग्रुप वाले लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं। इसकी मुख्य चुनौती तब सामने आती है, जब किसी बीमारी, दुर्घटना, ऑपरेशन या दूसरी मेडिकल स्थिति में रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे समय में उपयुक्त डोनर की पहचान और उपलब्धता बेहद अहम हो जाती है। रक्त की जरूरत कितनी है, यह मरीज की स्थिति और डॉक्टरों के आकलन पर निर्भर करता है। एक डोनर का रक्तदान जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त होगा या नहीं, यह भी इसी पर निर्भर करता है।



