Thursday, January 27, 2022
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TRP Special : भगवान राजीव लोचन और राम-सीता के वनवास से जुड़ा है राजिम पुन्नी मेला का इतिहास

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टीआरपी डेस्क। त्रिवेणी संगम पर स्थित भगवान राजीव लोचन की नगर में इस साल 27 फरवरी से राजिम पुन्नी मेला का आयोजन किया जाएगा। राजिम का इतिहास में कई पौराणिक धार्मिक मान्ताओं को अपने आप में समेटे हुए है।

मान्यता है कि जब सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी तब भगवान विष्णु की नाभि से निकला कमल इसी जगह पर था. और ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी. इसके चलते इस जगह का नाम कमल क्षेत्र पड़ा। त्रिवेणी संगम के बीच स्थित प्राचीन कुलेश्वर महादेव का विशाल मंदिर के बारे में मान्यता है कि वनवास काल में भगवान श्रीराम ने कुलेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना की थी।

भगवान राजीव लोचन की तीर्थस्थली में सैकड़ों साल से माघ पूर्णिमा पर राजिम मेला लगता आ रहा है। प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक पंद्रह दिनों का मेला लगता है। राजिम महानदी, पैरी नदी तथा सोढुर नदी का संगम स्थल है, इसलिए इसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है।

संगम स्थल पर कुलेश्वर महादेव जी विराजमान है। वर्ष 2001 से राजिम मेले को राजीव लोचन महोत्सव के रूप में मनाया जाता था, मगर 2005 से इसे कुम्भ के रूप में मनाया जाता रहा था, और अब 2019 से राजिम पुन्नी मेला महोत्सव मनाया जाएगा। यह आयोजन छत्तीसगढ़ शासन संस्कृति विभाग, एवम स्थानीय आयोजन समिति के सहयोग से होता है।

कल्पवास से होती मेला की शुरुआत

मेला की शुरुआत कल्पवास से होती है। पखवाड़े भर पहले से श्रद्धालु पंचकोशी यात्रा प्रारंभ कर देते हैंै। पंचकोशी यात्रा में श्रद्धालु पटेश्वर, फिंगेश्वर, ब्रम्हनेश्वर, कोपेश्वर तथा चम्पेश्वर नाथ के पैदल भ्रमण कर दर्शन करते है तथा धुनी रमाते है।

करीब 101 किमी की यात्रा का समापन होता है। राजिम पुन्नी मेला में साधू संतों के साथ स्थानीय श्रद्धाओं आगमन होता है। राजिम पुन्नी मेला में विभिन्न राज्यों से लाखांे की संख्या में लोग आते है,और भगवान श्री राजीव लोचन, तथा श्री कुलेश्वर नाथ महादेव जी के दर्शन करते है, और अपना जीवन धन्य मानते है।

लोगों में मान्यता है की भनवान जगन्नाथपुरी जी की यात्रा तब तक पूरी नही मानी जाती जब तक भगवान श्री राजीव लोचन तथा श्री कुलेश्वर नाथ के दर्शन नहीं कर लिए जाते, इसलिए छत्तीसगढ़ ही नहीं देश में राजिम कुम्भ का अपना एक विशेष महत्व है।

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