Janmashtami Kheera Puja: आज देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व अत्यंत धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस पावन अवसर पर घरों से लेकर मंदिरों तक भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की भव्य तैयारियां चल रही हैं। भक्त आधी रात को कन्हैया के जन्म का उत्सव मनाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इस पर्व से जुड़ी कई ऐसी प्राचीन परंपराएं हैं, जिनका धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है। इन्हीं प्रमुख परंपराओं में से एक है खीरे को काटने की परंपरा, जिसे कई स्थानों पर भगवान कृष्ण के जन्म के समय होने वाले नाल छेदन का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिस प्रकार शिशु के जन्म के बाद उसकी नाल अलग की जाती है, ठीक उसी भाव को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने के लिए जन्माष्टमी की पूजा में खीरे का इस्तेमाल किया जाता है। खीरे को भगवान कृष्ण का प्रतीक मानकर उसमें नाल जैसी डंडी लगी रहने दी जाती है। मध्यरात्रि में कृष्ण जन्म के समय विशेष पूजा के बाद इस डंडी या नाल को काटने की परंपरा निभाई जाती है।
कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली कृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख और सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था। उनका जन्म मथुरा में अत्याचारी कंस के कारागार में हुआ था। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने धरती पर अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए अवतार लिया था।
जन्माष्टमी के दिन भक्त व्रत और उपवास रखते हैं तथा भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। रात ठीक 12 बजे कृष्ण जन्म के समय शंख और घंटियां बजाकर उत्सव मनाया जाता है। देश के तमाम मंदिरों में सुंदर झांकियां सजाई जाती हैं। भगवान को नए वस्त्र, माखन-मिश्री तथा अन्य मनभावन भोग अर्पित किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि जन्माष्टमी के दिन श्रद्धा भाव से भगवान कृष्ण की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि और मन की शांति प्राप्त होती है।
जन्माष्टमी पर खीरा क्यों काटते हैं?
सनातन परंपरा और लोक मान्यताओं में खीरे को माता देवकी के गर्भ का प्रतीक माना जाता है। वहीं, खीरे के डंठल को गर्भनाल का रूप दिया जाता है। इस परंपरा के लिए हमेशा एक अच्छा और ताजा खीरा चुना जाता है। यह अनुष्ठान ठीक आधी रात यानी 12 बजे शुरू होता है। खीरे को एक पवित्र बर्तन में रखकर उसके डंठल को चाकू या किसी साफ उपकरण से अलग कर दिया जाता है। डंठल अलग होते ही भगवान कृष्ण का जन्म पूर्ण मान लिया जाता है।
डंठल काटने के ठीक बाद लड्डू गोपाल की मूर्ति को बाहर निकाला जाता है। इसके बाद उनका गंगजल, दूध और जल समेत पंचामृत से भव्य स्नान कराया जाता है। स्नान के बाद भगवान का मुख्य पूजन और श्रृंगार प्रारंभ होता है।
कैसे किया जाता है खीरे का नाल छेदन?
परंपरा के अनुसार, पूजा के लिए एक ताजा खीरा लिया जाता है, जिसमें उसका डंठल सुरक्षित रूप से लगा हुआ हो। खीरे को अच्छी तरह साफ करके पूजा स्थल पर भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या बाल गोपाल के पास रखा जाता है। इसके बाद भगवान का पंचामृत से अभिषेक, पूजन और आरती की जाती है।
मध्यरात्रि में जब कृष्ण जन्म का सटीक समय माना जाता है, तब शंख-घंटियों की गूंज और आनंद के जयकारों के बीच खीरे की डंडी को चाकू या पूजा में इस्तेमाल होने वाले साफ उपकरण से काटा जाता है। कई परिवारों में इसे पारंपरिक रूप से ‘नाल छेदन’ कहा जाता है। इसके पश्चात खीरे को भगवान को अर्पित किया जाता है और अंत में इसे प्रसाद के रूप में परिवार के सभी सदस्यों में बांट दिया जाता है।
प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है खीरा
मान्यता है कि कृष्ण जन्म के समय खीरे का नाल छेदन करने से भक्त भगवान के इस दिव्य जन्मोत्सव में प्रत्यक्ष रूप से सहभागी होने का गहरा भाव अनुभव करते हैं। जन्माष्टमी की रात जब देश के मंदिरों और घरों में ‘नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के गूंजते हुए जयकारे सुनाई देते हैं, तब यह छोटी-सी और प्यारी परंपरा कृष्ण जन्म की खुशियों को और अधिक विशेष बना देती है।


