Dindori Fossil Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश के डिंडोरी के घने जंगलों में एक ऐसी खोज सामने आई है, जिसने आस्था और विज्ञान के बीच एक अनोड़ा संबंध दिखाया है। बैगा जनजाति के लोग जिस पत्थर को सदियों से पवित्र मानकर उसकी रक्षा करते आ रहे थे, वैज्ञानिक जांच में वह करीब 6.5 करोड़ साल पुरानी कोरल यानी मूंगा जीवाश्म संरचना निकली। यह उस दौर की निशानी है, जब धरती पर डायनासोर का युग अपने अंतिम दौर में था।

मध्य प्रदेश के पुरातत्व, अभिलेखागार और संग्रहालय निदेशालय की टीम ने डिंडोरी के जंगलों में मंदिर जैसी दिखने वाली इस अनोखी संरचना की पहचान की। इसे एक मंदिर में सुरक्षित रखा गया था और स्थानीय बैगा समुदाय इसकी पूजा करता था।

डायनासोर के दौर की कहानी कहता है पत्थर

यह जीवाश्म उस समय का है जब पृथ्वी आज से पूरी तरह अलग थी। उत्तरी अमेरिका में टी-रेक्स जैसे डायनासोर मौजूद थे, जबकि भारत में दक्कन क्षेत्र में ज्वालामुखीय गतिविधियां जारी थीं। इसी दौर में राजासॉरस नर्मदेन्सिस जैसे डायनासोर भी भारत में पाए जाते थे। करीब 6.5 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर हुई बड़ी घटनाओं ने जीवन की दिशा बदल दी। मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप में करीब 10 किलोमीटर चौड़े क्षुद्रग्रह के टकराने और भारत के दक्कन ट्रैप्स में बड़े पैमाने पर ज्वालामुखीय गतिविधियों के बीच दुनिया में भारी पर्यावरणीय बदलाव हुए। इसके बाद करीब 75 प्रतिशत जीव-जंतुओं के खत्म होने की बात सामने आती है और डायनासोर का युग समाप्त हो गया।

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बैगा समुदाय सदियों से करता रहा पत्थर की रक्षा

इस अनोखी संरचना की तस्वीरें डिंडोरी की भू-वैज्ञानिक संपदा के दस्तावेजीकरण के दौरान सामने आईं। इसकी परतदार और कोरल जैसी बनावट ने विशेषज्ञों का ध्यान खींचा। इसके बाद मौके पर जाकर जांच की गई और कई परीक्षण किए गए। एएसआई के पुरातत्वविद् डॉ. मनोज कुमार कुर्मी के अनुसार, इस पत्थर से जुड़े मंदिर की परंपरा 8,000 से 10,000 साल पुरानी हो सकती है। उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में वास्तुकला के लिहाज से मंदिर नहीं होते थे। लोग प्रकृति की पूजा करते थे। किसी पत्थर, पेड़, पहाड़ या दूसरी प्राकृतिक चीज को पवित्र मानकर उसकी पूजा की जाती थी। बाद में उसी स्थान को मंदिर का रूप दिया गया होगा।

वैज्ञानिक उपकरण नहीं थे, लेकिन विरासत की पहचान थी

पुरातत्व विभाग के कमिश्नर मदन कुमार नागरगोजे ने कहा कि संभव है कि आदिवासी समुदाय के पास चट्टानों की उम्र या उनकी संरचना जानने के वैज्ञानिक उपकरण नहीं रहे हों। लेकिन उन्हें यह समझ थी कि उनके पास कुछ कीमती है और उसकी रक्षा करनी चाहिए। बैगा समुदाय को खास तौर पर कमजोर आदिवासी समूह के तौर पर पहचाना जाता है। यह समुदाय डिंडोरी समेत घने जंगलों वाले इलाकों में रहता है। ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र को बैगाचक के नाम से जाना जाता है। जंगल बैगा जीवन का अहम हिस्सा हैं। जंगल से उन्हें भोजन, दवा और रोजगार मिलता है। इसके साथ ही पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक जानकारी भी इन्हीं जंगलों के साथ जुड़ी हुई है।

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डिंडोरी को कहा गया मानव-विज्ञान का खजाना

डिंडोरी में आदिवासी समुदाय के साथ काम करने वाली और घोडामाडा गुफाओं में पाषाण युग के रॉक शेल्टर को रिकॉर्ड करने में मदद करने वाली गायनेकोलॉजिस्ट प्रियंका घोष ने इस खोज को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, डिंडोरी मानव-विज्ञान का खजाना है और ऐसा छिपा हुआ संदूक है, जिसे अभी समझने की जरूरत है। डिंडोरी में मिली कुछ चुनिंदा चीजों को जल्द ही भोपाल के स्टेट म्यूजियम की नई गैलरी में प्रदर्शित किया जाएगा।

रंजना वर्मा पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़ी अनुभवी न्यूज राइटर हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। रायपुर के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश से जुड़े समसामयिक मुद्दों के साथ राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, कारोबार, तकनीक और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लेखन किया है। समाचार लेखन के साथ SEO आधारित कंटेंट तैयार करने में भी उनकी अच्छी पकड़ है। सरल भाषा में तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है।