कांग्रेस में कभी पड़े थे अलग-थलग, अब पंजाब की कमान! सचिन पायलट कैसे बने राहुल गांधी के भरोसेमंद, यहां पढ़ें इनसाइट स्टोरी
कांग्रेस में कभी पड़े थे अलग-थलग, अब पंजाब की कमान! सचिन पायलट कैसे बने राहुल गांधी के भरोसेमंद, यहां पढ़ें इनसाइट स्टोरी

नई दिल्ली। कभी कांग्रेस में राजस्थान की सियासत को लेकर अलग-थलग पड़े नजर आने वाले सचिन पायलट का पार्टी में कद लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस ने अब उन्हें पंजाब जैसी अहम चुनावी जिम्मेदारी सौंपी है। अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले पायलट को प्रदेश का प्रभारी बनाया जाना दिल्ली दरबार के पॉवर पॉलिटिक्स में बड़े संकेत दे रहा है।

पायलट के सामने सबसे बड़ी चुनौती पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी को खत्म करना है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच लंबे समय से जारी खींचतान पार्टी के लिए बड़ी परेशानी बनी हुई है। ऐसे में सवाल है कि क्या सचिन पायलट दोनों धड़ों को एक मंच पर लाकर कांग्रेस को चुनावी मुकाबले के लिए तैयार कर पाएंगे?

पंजाब में पायलट की एंट्री क्यों है अहम?

कांग्रेस में हालिया संगठनात्मक फेरबदल के तहत सचिन पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी दी गई है। पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में चुनाव से पहले पायलट पर भरोसा जताया है। बता दें कि इससे पहले वह छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी की भूमिका निभा रहे थे।

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कांग्रेस को इस बार पंजाब में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है और इसलिए पार्टी किसी भी तरह की अंदरूनी कलह को चुनावी नुकसान में बदलने नहीं देना चाहती। पायलट को ऐसी जिम्मेदारी ऐसे समय मिली है जब कांग्रेस के सामने आम आदमी पार्टी, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल जैसी पार्टियों से मुकाबले की चुनौती है।

चन्नी बनाम राजा वडिंग की लड़ाई बनी सबसे बड़ी चुनौती

पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से दो प्रमुख खेमों के बीच खींचतान चल रही है। एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग हैं, तो दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री और प्रमुख दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी का प्रभाव है। दोनों नेताओं के बीच मतभेद कई मौकों पर सार्वजनिक भी हो चुके हैं।

पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा भी चन्नी खेमे के साथ माने जाते हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने एक जुलाई को राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला किया था। साथ ही चन्नी को पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन इससे विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

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वहीं चन्नी समर्थक नेताओं का एक धड़ा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग करता रहा है। इसके अलावा चन्नी समर्थकों की इच्छा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री को कांग्रेस का मुख्यमंत्री चेहरा घोषित किया जाए।

भूपेश बघेल क्यों नहीं सुलझा पाए विवाद?

पंजाब कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी को खत्म करने की जिम्मेदारी पूर्व प्रभारी भूपेश बघेल के पास थी। बघेल ने पंजाब के कई दौरे भी किए, लेकिन दोनों खेमों के बीच पूरी तरह सहमति नहीं बन पाई। पार्टी के कार्यक्रमों में भी कई बार अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आते रहे।

ऐसे में राहुल गांधी ने सचिन पायलट को पंजाब की कमान सौंपकर गुटों में बंटी कांग्रेस की नाराजगी कम करने की कोशिश की है। मगर पार्टी के सामने चुनौती सिर्फ नेताओं को एकजुट करने की नहीं है। उसे चुनाव से पहले संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना और चुनाव में जीत के लिए तैयार करने की होगी।

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लगातार बढ़ रहा सचिन पायलट का कद

सचिन पायलट कभी राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई के चलते पार्टी में मुश्किल दौर से गुजर रहे थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनकी राजनीतिक भूमिका लगातार बढ़ी है। पायलट को कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के करीबी नेताओं में माना जाता है। युवा चेहरा होने के कारण पार्टी में उनकी अलग पहचान है।

2023 में उन्हें कांग्रेस महासचिव बनाया गया और छत्तीसगढ़ का प्रभारी नियुक्त किया गया। अब पंजाब जैसे महत्वपूर्ण चुनावी राज्य की जिम्मेदारी मिलना उनके बढ़ते राजनीतिक कद का एक और संकेत माना जा रहा है।

पार्टी के लिए पायलट की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि वह संगठन के भीतर संवाद और तालमेल बनाने की कोशिश करते हैं। पंजाब जैसे गुटबाजी से जूझ रहे राज्य में यही भूमिका उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण होने वाली है।