Chhattisgarh unique wedding ritual: छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के भूपदेवपुर क्षेत्र के बिलासपुर गांव में शादी की एक अनोखी परंपरा आज भी निभाई जा रही है। यहां राठिया परिवार में नई नवेली बहू का गृह प्रवेश जलते हुए अंगारों पर चलकर होता है। हाल ही में जयप्रकाश राठिया की शादी बाड़ादरहा गांव में हुई।
बारात बिलासपुर पहुंचने के बाद दूल्हा-दुल्हन ने घर के आंगन में बिछाए गए दहकते अंगारों पर सात फेरे लिए। परिवार और गांव के लोगों के अनुसार, यह परंपरा 100 साल से अधिक पुरानी है। यह रस्म इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें शादी के बाद घर में प्रवेश करने वाली दुल्हन के साथ दूल्हा भी अंगारों पर फेरे लेता है। परिवार इसे आस्था और परंपरा से जोड़कर देखता है।
क्या है यह अनोखी परंपरा?
भूपदेवपुर के बिलासपुर गांव में राठिया परिवार की बहू के गृह प्रवेश से पहले विशेष रस्म निभाई जाती है। दूल्हा-दुल्हन को जलते हुए अंगारों पर सात फेरे लेने होते हैं। हाल ही में जयप्रकाश राठिया और उनकी पत्नी ने भी इसी परंपरा के तहत अंगारों पर फेरे लिए। गांव के लोगों के अनुसार, इस रस्म को गंधेल गोत्र के परिवार लंबे समय से निभाते आ रहे हैं।
शादी के बाद कैसे होती है रस्म?
परंपरा के अनुसार, बहू के आने से पहले परिवार के सदस्य उपवास रखते हैं। इस दौरान पानी तक ग्रहण नहीं करने की बात बताई गई है। जब बारात बिलासपुर गांव पहुंचती है, तो नवविवाहित जोड़े का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया जाता है। उन्हें नए कपड़े और आभूषण भेंट किए जाते हैं। इसके बाद गृह प्रवेश की मुख्य रस्म शुरू होती है। दूल्हे के पिता मेहत्तर राठिया के बारे में बताया गया कि उन पर देवता का आह्वान हुआ। उन्होंने मंडप के बीच दहकते अंगार बिछाए और खुद उन पर नृत्य किया। इसके बाद दूल्हा और दुल्हन ने हाथों में हाथ डालकर जलते अंगारों पर सात फेरे लिए।
क्यों निभाई जाती है यह रस्म?
परिवार और गांव के लोगों के अनुसार, यह परंपरा आस्था और विश्वास से जुड़ी है। मान्यता है कि जो नवविवाहित जोड़ा इस अग्नि परीक्षा को पूरा करता है, उसे जीवन की मुश्किलों का साथ मिलकर सामना करने की शक्ति मिलती है। यानी इस रस्म को केवल विवाह की एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पति-पत्नी के साथ और विश्वास के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। हालांकि, इस परंपरा से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक और सांस्कृतिक विश्वासों पर आधारित हैं।
परंपरा कितनी पुरानी है?
गांववालों के मुताबिक, यह परंपरा 100 वर्षों से भी अधिक पुरानी है। गंधेल गोत्र के परिवार आज भी इसे श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। आधुनिक समय में विवाह की कई रस्मों में बदलाव आया है, लेकिन बिलासपुर गांव में यह परंपरा अब भी अपने पुराने स्वरूप में निभाई जा रही है।
किस पर असर पड़ता है?
इस परंपरा का सीधा संबंध राठिया परिवार और गंधेल गोत्र से बताया गया है। शादी के दौरान परिवार के सदस्य और गांव के लोग भी इस आयोजन में शामिल होते हैं। दूल्हा और दुल्हन के लिए यह रस्म विवाह के बाद की एक महत्वपूर्ण पारिवारिक परंपरा मानी जाती है।
इस परंपरा की खास बातें
- यह परंपरा रायगढ़ जिले के भूपदेवपुर क्षेत्र के बिलासपुर गांव में बताई गई है।
- राठिया परिवार में बहू के गृह प्रवेश से पहले यह रस्म होती है।
- दूल्हा-दुल्हन जलते अंगारों पर सात फेरे लेते हैं।
- दूल्हे के पिता द्वारा अंगारों पर नृत्य करने की भी परंपरा बताई गई है।
- गंधेल गोत्र के परिवार इसे निभाते आ रहे हैं।
- गांववालों के अनुसार, यह परंपरा 100 वर्षों से अधिक पुरानी है।
- परिवार इसे आस्था, विश्वास और दांपत्य जीवन से जुड़ी मान्यता के रूप में देखता है।
5 FAQs
1. रायगढ़ में दूल्हा-दुल्हन अंगारों पर फेरे क्यों लेते हैं?
गांववालों के अनुसार, यह परंपरा आस्था और विश्वास से जुड़ी है। मान्यता है कि इससे दंपती को जीवन की कठिनाइयों का साथ मिलकर सामना करने की शक्ति मिलती है।
2. यह परंपरा कहां निभाई जाती है?
यह परंपरा रायगढ़ जिले के भूपदेवपुर क्षेत्र के बिलासपुर गांव में राठिया परिवार में निभाई जाती है।
3. अंगारों पर कितने फेरे लिए जाते हैं?
दूल्हा और दुल्हन जलते अंगारों पर सात फेरे लेते हैं।
4. यह परंपरा कितनी पुरानी बताई जाती है?
गांववालों के अनुसार, यह परंपरा 100 वर्षों से भी अधिक पुरानी है।
5. इस परंपरा को कौन से परिवार निभाते हैं?
बताया गया है कि गंधेल गोत्र के राठिया परिवार इसे आज भी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।


