टीआरपी डेस्क। अंडमान और निकोबार के शांत द्वीपों पर इन दिनों विकास और विनाश की एक ऐसी जंग छिड़ी है जिसने दिल्ली के सियासी गलियारों में भूकंप ला दिया है। केंद्र सरकार के 92,000 करोड़ रुपये के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मोर्चा खोल दिया है। निकोबार पहुंचे राहुल ने इस मेगा प्रोजेक्ट को देश की प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा अपराध करार दिया है। सूत्रों की मानें तो यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक भी पहुंच सकता है।

92 हजार करोड़ का दांव: आखिर क्या है ये मेगा प्रोजेक्ट?

सरकार इस प्रोजेक्ट के जरिए निकोबार को दुनिया का बड़ा आर्थिक और रणनीतिक हब बनाना चाहती है। इस योजना के तहत वहां एक हाईटेक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, इंटरनेशनल एयरपोर्ट, एक बड़ा शहर (इंटीग्रेटेड टाउनशिप) और गैस-सोलर पावर प्लांट बनाया जाना है। यह पूरा तामझाम करीब 166 वर्ग किलोमीटर में फैलेगा। लेकिन असली पेंच ये है कि इसमें से 130 वर्ग किलोमीटर सिर्फ जंगल की जमीन है। सरकारी आंकड़ों की ही मानें तो यहां करीब 7.11 लाख पेड़ काटे जाने की तैयारी है, जिसे लेकर पर्यावरण प्रेमी और विपक्षी दल भड़के हुए हैं।

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राहुल गांधी का तीखा प्रहार: विनाश की भाषा है ये

निकोबार के दौरे से लौटते ही राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर सीधा हमला बोला। उन्होंने स्थानीय निकोबारी समुदाय और पूर्व सैनिकों के परिवारों से मुलाकात के बाद कहा यहां विकास के नाम पर जो हो रहा है, वह असल में विनाश है। लाखों पेड़ों की बलि और आदिवासियों की विरासत को खत्म करना एक गंभीर अपराध है। राहुल का दावा है कि यह प्रोजेक्ट देश की सुरक्षा के नाम पर चुनिंदा उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने का एक बड़ा घोटाला है।

मोदी सरकार की सफाई: न हटेगा आदिवासी, न खत्म होगा जंगल

राहुल के आरोपों पर केंद्र सरकार ने अपनी फैक्टशीट जारी कर कड़ा पलटवार किया है। सरकार का कहना है कि यह प्रोजेक्ट भारत की समुद्री ताकत और चीन के खिलाफ रणनीतिक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी आदिवासी (निकोबारी या शोम्पेन) को उनकी जगह से नहीं हटाया जाएगा। जितने पेड़ कटेंगे, उससे ज्यादा दूसरी जगहों पर लगाए जाएंगे। पर्यावरण संरक्षण के लिए 42 सख्त शर्तें लागू की गई हैं।

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जमीन पर हकीकत: आदिवासियों ने वापस ली एनओसी

भले ही सरकार सुरक्षा का हवाला दे रही हो, लेकिन जमीन पर रहने वाले निकोबारी समुदाय में भारी गुस्सा है। समुदाय का कहना है कि उन्होंने अपनी जमीन देने के लिए जो अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) दिया था, उसे अब वापस ले लिया है। आदिवासियों का आरोप है कि उनके फॉरेस्ट राइट्स यानी वन अधिकारों को दरकिनार किया जा रहा है और उन पर जमीन छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है। कुल मिलाकर, निकोबार की ये लड़ाई अब सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह मानवाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच के बड़े टकराव में बदल चुकी है।

रंजना वर्मा पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़ी अनुभवी न्यूज राइटर हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। रायपुर के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश से जुड़े समसामयिक मुद्दों के साथ राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, कारोबार, तकनीक और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लेखन किया है। समाचार लेखन के साथ SEO आधारित कंटेंट तैयार करने में भी उनकी अच्छी पकड़ है। सरल भाषा में तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है।