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Bhojli Festival Kotba: भाइयों से पहले मवेशियों को बांधी जाती है राखी, जानिए जशपुर के कोतबा की अनोखी भोजली परंपरा

Bhojli Festival Kotba: भाइयों से पहले मवेशियों को बांधी जाती है राखी, जानिए जशपुर के कोतबा की अनोखी भोजली परंपरा
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

Bhojli Festival Kotba: रक्षाबंधन सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार नहीं है। जशपुर जिले के आदिवासी बहुल कोतबा अंचल में इस दिन लोक परंपरा और कृषि जीवन से जुड़ी एक खास रस्म निभाई जाती है। यहां अविवाहित कन्याएं सात दिनों तक भोजली के रूप में मां गंगा और जवारा की पूजा करती हैं।

सावन पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के दिन जवारा का विसर्जन किया जाता है। इसके बाद कृषि कार्य में उपयोग होने वाले मवेशियों को नहला-धुलाकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें रक्षा सूत्र बांधा जाता है। इसके बाद ही बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं।

यह परंपरा क्यों खास है?

कोतबा क्षेत्र में रक्षाबंधन के दिन मनाया जाने वाला भोजली पर्व स्थानीय लोक संस्कृति और कृषि जीवन से जुड़ा है। आधुनिकता के दौर में भी यह परंपरा अपने मूल रूप में चली आ रही है। इस आयोजन में बुजुर्गों के साथ युवा और बच्चे भी हिस्सा लेते हैं। भोजली के पारंपरिक लोकगीतों से पूरा क्षेत्र गूंज उठता है। इससे रक्षाबंधन का पर्व यहां एक अलग सांस्कृतिक रूप में नजर आता है।

क्या है भोजली पर्व?

भोजली के नाम से प्रसिद्ध यह पारंपरिक त्योहार अविवाहित कन्याओं द्वारा मनाया जाता है। इसमें कुलदेवता और जवारा की विधि-विधान से पूजा की जाती है। यह पूजा सात दिनों तक चलती है। इस दौरान महिलाएं भोजली के पारंपरिक गीत गाती हैं। सावन पूर्णिमा के दिन जवारा का विसर्जन किया जाता है। इसी के साथ पूजा की प्रक्रिया पूरी होती है।

कैसे निभाई जाती है यह परंपरा?

रक्षाबंधन के दिन गंगा देवी के जवारा के विसर्जन के लिए महिलाओं द्वारा शोभायात्रा निकाली जाती है। महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाते हुए नगर के तालाब तक पहुंचती हैं। यहां जवारा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन के बाद घर के पालतू कृषि मवेशियों को नहला-धुलाकर साफ किया जाता है। इसके बाद उनकी पूजा की जाती है और महिलाओं द्वारा उन्हें राखी बांधी जाती है। परंपरा के मुताबिक मवेशियों को रक्षा सूत्र बांधने के बाद ही बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं।

गंगा माता से जुड़ी है मान्यता

इस परंपरा में मां गंगा की पूजा का भी विशेष स्थान है। मान्यता के अनुसार सात दिनों तक गंगा देवी की पूजा-अर्चना करने वाली कन्याओं द्वारा मांगी गई मन्नत पूरी होती है। पूजा की विधि पूरी होने के बाद गंगा देवी के पौधे को कान में लगाया जाता है। इसके बाद लोग एक-दूसरे से गले मिलते हैं और घर के बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते हैं।

किस परंपरा का संदेश देती है भोजली?

भोजली पर्व में भाई-बहन के स्नेह के साथ कृषि जीवन और मवेशियों के प्रति सम्मान भी दिखाई देता है। खेती-किसानी में उपयोग होने वाले मवेशियों को पहले रक्षा सूत्र बांधना इसी परंपरा का हिस्सा है। जशपुर जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र में त्योहारों को मनाने की अपनी अलग लोक परंपराएं हैं। रक्षाबंधन के दिन गंगा माता की पूजा और मवेशियों को राखी बांधना भी इसी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।

जानें भोजली से जुड़े नियम

  • कोतबा अंचल में रक्षाबंधन के दिन भोजली पर्व की परंपरा निभाई जाती है।
  • अविवाहित कन्याएं सात दिनों तक मां गंगा और जवारा की पूजा करती हैं।
  • इस दौरान महिलाएं पारंपरिक भोजली गीत गाती हैं।
  • सावन पूर्णिमा के दिन जवारा का विसर्जन किया जाता है।
  • विसर्जन के बाद कृषि मवेशियों को नहला-धुलाकर उनकी पूजा की जाती है।
  • मवेशियों को रक्षा सूत्र बांधने के बाद ही भाई की कलाई पर राखी बांधी जाती है।
  • पूजा के बाद गंगा देवी के पौधे को कान में लगाने और बुजुर्गों से आशीर्वाद लेने की परंपरा है।
  • जवारा विसर्जन के लिए महिलाओं द्वारा शोभायात्रा निकाली जाती है।

जवारा विसर्जन के साथ सात दिन बाद पूजा संपन्न

रक्षाबंधन के दिन पूजा और जवारा विसर्जन के साथ भोजली की सात दिनों की पूजा संपन्न होती है। इसके बाद मवेशियों की पूजा और उन्हें राखी बांधने की रस्म निभाई जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में क्षेत्र के बुजुर्गों, युवाओं और बच्चों की भागीदारी रहती है। कोतबा की यह परंपरा दिखाती है कि रक्षाबंधन का त्योहार अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय संस्कृति और कृषि जीवन से जुड़कर अलग रूप लेता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

  1. जशपुर के कोतबा में रक्षाबंधन पर कौन सी अनूठी परंपरा निभाई जाती है?यहां बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधने से पहले खेती-किसानी में काम आने वाले मवेशियों को नहलाकर रक्षा सूत्र बांधती हैं।
  2. भोजली पर्व में पूजा कितने दिनों तक चलती है?भोजली पर्व में कुलदेवता और जवारा की विशेष पूजा-अर्चना सात दिनों तक चलती है।
  3. भोजली पूजन में मुख्य रूप से कौन भाग लेता है?यह पूजन मुख्य रूप से अविवाहित कन्याओं और महिलाओं द्वारा किया जाता है, जिसमें पूरा परिवार शामिल होता है।
  4. जवारा विसर्जन किस दिन और कहां किया जाता है?सावन पूर्णिमा के दिन पारंपरिक लोक गीत गाते हुए शोभायात्रा निकाली जाती है और जवारा का विसर्जन नगर के तालाब में किया जाता है।
  5. भोजली विसर्जन के बाद क्या रिवाज निभाया जाता है?विसर्जन के बाद गंगा देवी के पौधे को एक-दूसरे के कान में लगाकर गले मिला जाता है और घर के बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है।
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