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शरद पूर्णिमा से दीपावली तक के 15 दिन, राम की प्रतीक्षा और वानर सेना की विदाई का क्या है संबंध?

आज शरद पूर्णिमा है। भारत की पर्व -परंपरा में इसका खास स्थान हैं। इस पर्व का महत्व केवल चंद्रमा की पूजा या खीर को चांदनी में रखने की परंपरा तक सीमित न होकर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, चांदनी की शीतलता, राधा-कृष्ण की रासलीला और रामकथा से जुड़े भावुक प्रसंगों की याद दिलाती है। इतना ही […]

Sharad Purnima 2026
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

आज शरद पूर्णिमा है। भारत की पर्व -परंपरा में इसका खास स्थान हैं। इस पर्व का महत्व केवल चंद्रमा की पूजा या खीर को चांदनी में रखने की परंपरा तक सीमित न होकर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, चांदनी की शीतलता, राधा-कृष्ण की रासलीला और रामकथा से जुड़े भावुक प्रसंगों की याद दिलाती है।

इतना ही नहीं, इस खास दिन पर प्रेम, प्रतीक्षा और साथ निभाने वालों के प्रति सम्मान का संदेश भी जुड़ा है। भारत की संस्कृति में नदियों, वृक्षों और सूर्य की पूजा के साथ शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की निर्मलता को भी महत्व दिया जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर वर्षा ऋतु विदा लेने के साथ आसमान साफ होता है और चांदनी रात को एक अलग ही रूप देती है।

चांदनी में खीर रखने की परंपरा

मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। इसी विश्वास के कारण इस रात खीर बनाकर चांदनी में रखने और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है। इसे शरीर और मन को शीतलता के अलावा लोक परंपराओं में इस रात चांदनी में सुई में धागा पिरोने की भी जानकारी मिलती है। मान्यता यह भी है कि, ऐसा करने से आंखों की रोशनी अच्छी होती है। हालांकि, इस दावे को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सकता।

राधा-कृष्ण की रासलीला का प्रसंग

शरद पूर्णिमा का संबंध भागवत पुराण से भी जुड़ा मिलता है। शरद पूर्णिमा के दिन श्रीकृष्ण और गोपियों की रासलीला का वर्णन मिलता है। परंपरा में इसे शरद की चांदनी, यमुना तट और भक्ति के भाव से जोड़कर देखा जाता है। इस प्रसंग ने हिंदी और ब्रज साहित्य में अनेक रचनाओं को प्रेरित किया। कवियों और भक्तों ने शरद की उजली रात, राधा-कृष्ण के प्रेम और रास के आनंद को अपनी रचनाओं में जगह दी। रास कीर्तन में शरद की रात और राधा-कृष्ण की छवि का विशेष वर्णन मिलता है।

रामकथा में वानर सेना की विदाई

शरद पूर्णिमा से जुड़ा एक भावुक सांस्कृतिक प्रसंग रामकथा से जुड़ा हुआ है। जिसमें वानर सेना की विदाई का उल्लेख है। रावण के वध के बाद प्रभु श्री राम अयोध्या लौट रहे थे, इससे पहले वानर सेना की विदाई का भावुक पल आया। रामालीलाओं में इस भावुक प्रसंग का वर्णन भी मिलता है। सुग्रीव, अंगद, जामवंत और हनुमान जैसे पात्र रामकथा में सहयोग, निष्ठा और मित्रता के प्रतीक हैं। वानर सेना की विदाई का दृश्य सम्मान की याद दिलाता है। जिन साथियों ने कठिन वक्त में साथ दिया। यह प्रसंग एक सांस्कृतिक संदेश भी है। कैसे संकट में साथ देने वालों को सम्मान के साथ विदा करना है।

शरद पूर्णिमा से दीपावली तक प्रतीक्षा का भाव

शरद पूर्णिमा और दीपावली के बीच 15 दिन का अंतर है। धार्मिक परंपरा में दीपावली का महत्व भगवान राम की परंपरा से जुड़ा हुआ है। शरद पूर्णिमा से दीपावली तक का समय प्रभु श्री राम की प्रतीक्षा से जुड़ा है। राम के लौटने की खबर मिलने के बाद अयोध्या के लोगों की मनःस्थिति उनके लिए वापसी और आनंद का अवसर था। मिलन भले ही एक क्षण का हो, लेकिन उसके लिए की गई तैयारी और इंतजार लंबे समय तक याद रहते हैं। दीपावली की सजावट, सफाई और दीप जलाने की तैयारी भी इसी भाव का हिस्सा है।

प्रकृति, प्रेम और कृतज्ञता का पर्व

शरद पूर्णिमा प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर है। इस पर्व का संदेश यही है कि उत्सव केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं। वह जीवन में रिश्तों, प्रकृति और कृतज्ञता का महत्व भी याद दिलाते हैं। शरद पूर्णिमा की चांदनी में इसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भाव को देखा जा सकता है।

Deeksha Mishra
लेखक / पत्रकार:

Deeksha Mishra

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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