Devotees gathered for rare darshan at Nagchandreshwar Temple in Ujjain on Nag Panchami

Ujjain Nagchandreshwar Temple: उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर की धार्मिक परंपराओं में नागचंद्रेश्वर मंदिर का एक विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यहां भगवान शिव और माता पार्वती के अद्भुत स्वरूप की पूजा की जाती है।

इस मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए साल में सिर्फ एक बार नाग पंचमी के अवसर पर खोले जाते हैं। यही वजह है कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं में इस दिन दर्शन को लेकर भारी उत्साह रहता है।

कहां स्थित है यह पावन मंदिर और क्या है इसकी खासियत?

नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की सबसे ऊपरी यानी तीसरी मंजिल पर स्थित है। महाकाल मंदिर के तीन स्तरों में सबसे नीचे महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उसके ऊपर ओंकारेश्वर और सबसे ऊपर नागचंद्रेश्वर मंदिर स्थित है। इस मंदिर की प्राचीन प्रतिमा लगभग 11वीं शताब्दी की बताई जाती है। इस अद्भुत प्रतिमा में भगवान शिव और माता पार्वती को नाग के फनों के नीचे विराजमान दिखाया गया है।

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साल में सिर्फ एक दिन क्यों खुलते हैं कपाट?

मंदिर के कपाट साल में केवल एक दिन खोलने के पीछे एक गहरी पौराणिक मान्यता जुड़ी हुई है। मान्यता है कि सर्पराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया था।

इसके अलावा, ऐसा कहा जाता है कि तक्षक नाग भगवान शिव के सान्निध्य में एकांत साधना करना चाहते थे। इसी वजह से मंदिर के कपाट साल भर बंद रहते हैं और केवल नाग पंचमी के दिन ही खोले जाते हैं।

नाग पंचमी और सावन सोमवार का दुर्लभ संयोग

नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए साल में सिर्फ एक बार नाग पंचमी के दिन खोले जाते हैं। इस दौरान करीब 24 घंटे तक श्रद्धालुओं को लगातार दर्शन का अवसर मिलता है। इसके बाद मंदिर के कपाट अगले साल नाग पंचमी तक फिर से बंद कर दिए जाते हैं।

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इस वर्ष नाग पंचमी 17 अगस्त, सोमवार को है। इस बार नाग पंचमी और सावन सोमवार का एक बेहद दुर्लभ और पवित्र संयोग भी बना है, जिससे मंदिर में भक्तों की संख्या में भारी वृद्धि देखी जा रही है।

नाग पंचमी पर विशेष पूजा-अर्चना की परंपरा

नाग पंचमी के दिन मंदिर के कपाट खुलने के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस अवसर पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जाती है। परंपरा के अनुसार, नाग पंचमी की शुरुआत में महानिर्वाणी अखाड़े के संतों और मंदिर समिति द्वारा विशेष पूजा की जाती है। इसके बाद ही आम भक्तों के लिए दर्शन की शुरुआत होती है।

प्रतिमा को लेकर जुड़ी मान्यताएं और प्रभाव

नागचंद्रेश्वर मंदिर की प्राचीन प्रतिमा को लेकर यह भी मान्यता है कि इसे नेपाल से उज्जैन लाया गया था। हालांकि, इसके नेपाल से लाए जाने का कोई मजबूत ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे केवल एक लोक मान्यता के रूप में ही देखा जाता है, न कि किसी पुख्ता ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।

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भक्तों का मानना है कि इस दिन दर्शन करने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-शांति आती है। प्रशासन और मंदिर समिति की ओर से भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और सुगम दर्शन के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।

डिसक्लेमर: इस लेख में मंदिर और नागचंद्रेश्वर से जुड़ी जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और उपलब्ध विवरणों पर आधारित है। धार्मिक मान्यताओं से जुड़े दावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य न माना जाए।

रजनी सेन टीआरपी में लाइफस्टाइल से जुड़ी खबरें लिखती हैं। उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी, खान-पान, फैशन, त्योहार, संस्कृति, ज्योतिष और बदलते लाइफस्टाइल ट्रेंड्स से जुड़े विषयों पर लिखने का अनुभव है। उनका लेखन सरल, सहज और पाठकों से जुड़ा हुआ है। रजनी सेन ने बैचलर ऑफ आर्ट्स (B.A.) की पढ़ाई की है और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी लेखन क्षमता के जरिए पाठकों तक उपयोगी और रोचक जानकारी पहुंचाने का प्रयास करती हैं।