बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए मृतक की मां की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दुर्घटना के समय मृतक अपने पिता के नाम पंजीकृत वाहन चला रहा था, तो वह मोटर वाहन अधिनियम के तहत उस वाहन का मालिक नहीं माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा, ऐसी स्थिति में उसके कानूनी वारिस वाहन मालिक या बीमा कंपनी से उसी आधार पर मुआवजे का दावा नहीं कर सकते। जस्टिस संजय कुमार जायसवाल ने अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, बिलासपुर के आदेश को बरकरार रखते हुए मृतक की मां द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया।
क्या है पूरा मामला
मामला बिलासपुर जिले के सीपत क्षेत्र के उज्ज्वल नगर निवासी विनिता पोबेरन कुजूर से जुड़ा है। उन्होंने अपने बेटे राज कुजूर की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद मोटर दुर्घटना मुआवजे के लिए दावा किया था।
याचिका के मुताबिक, 21 मार्च 2021 को राज कुजूर मोटरसाइकिल चला रहा था। इसी दौरान दुर्घटना में उसे गंभीर चोटें आईं और बाद में उसकी मौत हो गई।
दुर्घटना के बाद मृतक की मां ने 25 जून 2021 को मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष मुआवजे के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था।
पिता के नाम थी मोटरसाइकिल
मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि दुर्घटना के समय राज जिस मोटरसाइकिल को चला रहा था, वह उसके पिता सुशील कुमार कुजूर के नाम पर पंजीकृत थी।
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना।
अदालत ने कहा कि मृतक स्वयं वाहन का पंजीकृत मालिक नहीं था। इसलिए दुर्घटना के समय वाहन चलाने के आधार पर उसे वाहन मालिक नहीं माना जा सकता और इस स्थिति में उसके कानूनी वारिस वाहन मालिक या बीमा कंपनी के खिलाफ संबंधित वैधानिक प्रावधान के तहत मुआवजे का दावा नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रामखिलाड़ी एवं अन्य बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने मौजूदा मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर मृतक के दावे की स्थिति पर विचार किया।
बीमा पॉलिसी में भी नहीं था अतिरिक्त कवर
हाईकोर्ट ने संबंधित बीमा पॉलिसी की भी जांच की। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि चालक या वाहन मालिक के जोखिम को कवर करने के लिए कोई अतिरिक्त प्रीमियम नहीं दिया गया था।
मोटरसाइकिल बजाज एलायंज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड से बीमित थी। इस आधार पर भी अदालत को मृतक के पक्ष में मुआवजा दावा स्वीकार करने का आधार नहीं मिला।
240 दिन की देरी माफ, लेकिन अपील खारिज
मृतक की मां की ओर से दायर अपील में 240 दिनों की देरी हुई थी। हाईकोर्ट ने इस देरी को माफ कर दिया, जिसके बाद मामले पर सुनवाई की गई। हालांकि, मामले के तथ्यों और कानूनी स्थिति पर विचार करने के बाद अदालत ने अपील को खारिज कर दिया।


