नई दिल्ली।
डेढ़ दशक तक अनिस्तारित पड़े रहे एनरॉन-दाभोल बिजली परियोजना के भ्रष्टाचार को आखिरकार तर्कपूर्ण नतीजे तक नहीं पहुंचाया जा सका।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस कथित भ्रष्टाचार के सिलसिले में वर्ष 1997 में दर्ज मुकदमे में विलंब को ध्यान में रखते हुए उसे बृहस्पतिवार को बंद कर दिया। इस मामले में कई नेता और नौकरशाह आरोपी थे। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने मुकदमा बंद करने की महाराष्ट्र सरकार की अर्जी स्वीकार कर ली।
महाराष्ट्र राज्य विद्युत बोर्ड के साथ 1993 में बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद अमेरिकी कंपनी एनरॉन और उसकी सहयोगी कंपनी दाभोल पावर कॉरपोरेशन ने 1996 में तीन अरब डॉलर की लागत से महाराष्ट्र में बिजली परियोजना स्थापित की थी।
शीर्ष अदालत ने 1997 में बिजली खरीद समझौते (पीपीए) को बरकरार रखने के बंबई उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए सेंटर फॉर इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू) की याचिका को स्वीकार किया था और हस्ताक्षर करने में सरकार और उसके अधिकारियों की भूमिका के सिलसिले में महाराष्ट्र राज्य विद्युत बोर्ड को नोटिस जारी किया था।

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रंजना वर्मा पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़ी अनुभवी न्यूज राइटर हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। रायपुर के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश से जुड़े समसामयिक मुद्दों के साथ राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, कारोबार, तकनीक और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लेखन किया है। समाचार लेखन के साथ SEO आधारित कंटेंट तैयार करने में भी उनकी अच्छी पकड़ है। सरल भाषा में तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है।