रायपुर। स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे दवाओं के स्थानीय खरीदी के नाम पर करोड़ों का खेल हो रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद स्वास्थ्य विभाग इन दवाओं की खरीदी के नाम पर हो रहे खेल को रोक पाने में विफल हो रहा है। विभाग के पास दवाओं की खरीदी का ब्यौरा भी पूरा नहीं है।

दवाओं की खरीदी में हो रही इस धांधली को रोकने के लिए संचालक स्वास्थ्य ने 19 जनवरी 2019 को जारी अपने आदेश में दवाओं की समस्त स्थानीय खरीदी का ब्यौरा छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन के ऑनलाइन पोर्टल में एंट्री करने के लिए कहा था। साथ ही सचिव स्वास्थ्य ने भी ऑनलाइन पोर्टल में स्थानीय क्रय की ऑनलाइन प्रविष्टि प्रतिदिन करने का आदेश जारी किया था।

मगर कमीशनखोरी की लत स्वास्थ्य महकमे में इसकदर हावी है कि विभाग को दवाओं के लोकल खरीदी की जानकारी ही नहीं दी जा रही है। संचालक स्वास्थ्य सेवाएं ने हाल ही में समस्त जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की बैठक में यह स्वीकार किया कि 27 में से 13 जिलों से ऑनलाइन एंट्री नहीं की जा रही है।

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कमीशनखोरी की भेंट चढ़ा स्वास्थ्य विभाग :

दरअसल यह पूरा खेल दवाओं की लोकल पर्चेजिंग कर कमीशनखोरी के लिए किया जाता है। सीजीएमएससी द्वारा स्थानीय क्रय के लिए जारी एनओसी के दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान वित्तीय वर्ष में अभी तक आवश्यक ड्रग लिस्ट दवाओं की ही 9 करोड़ रुपयों से अधिक की स्थानीय क्रय की जा चुकी है।

जबकि अभी आधे से अधिक जिले आंकड़ों की एंट्री ऑनलाइन नहीं कर रहे हैं। यदि इसमें गैर आवश्यक दवाओं और सामग्री को भी जोड़ दिया जाए तो ये आंकड़े 25-28 करोड़ से भी अधिक होने का अनुमान है।

 

ऐसे होता है भ्रष्टाचार का खेल :

संचालनालय स्वास्थ्य सेवा एवं चिकित्सा शिक्षा द्वारा अपनी अधीनस्थ संस्थाओं से दवा, उपकरण और सामग्री के क्रय के लिए वार्षिक मांग पत्र मंगवाया जाता है, जिसे संचालनालय स्तर पर युक्तियुक्तकरण के बाद क्रय के लिए अनुशंसा पत्र सीजीएमएससी को भेजा जाता है।

जिलों से आए मांग पत्र में जानबूझकर कम मात्रा डाली जाती है। बाद में सीजीएमएससी से एनओसी (अनापत्ति) प्राप्त कर स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त मांग दर्शाते हुए खरीदी की जाती है। जैसे किसी जिले में 20,000 एंटीबायोटिक दवाएं चाहिए। मगर जिले द्वारा मांग 5 हजार दवाओं की ही की जाती है।

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सीजीएमएससी से अनापत्ति प्राप्त करते ही तत्काल में इसकी मात्रा बढ़ाते हुए 15 हजार अतिरिक्त दवाओं की मांग दर्शाते हुए स्थानीय स्तर पर  3 गुने अधिक दर पर खरीदी की जाती है।

 

नहीं भेजी डिमांड :

वित्तीय वर्ष 2016 -17 से 2019 -2020 तक संचालक स्वास्थ्य सेवाएं ने कोई भी मांग पत्र ही प्रेषित नहीं किया था। समस्त खरीदी स्थानीय स्तर पर ही की गयी।

एनओसी मांगी 36 करोड़ की, लेकिन खरीदी की जानकारी नहीं दी बीते आठ माह में जिलों से 36 करोड़ की लोकल पर्चेजिंग की जानकारी के लिए एनओसी लिया गया है।

इसके लिए डीएचएस से सिर्फ आठ माह में 17 करोड़ रुपए स्थानीय खरीदी के लिए जारी किए जा चुके हैं। यह पूरी तरह से दवाओं की कमीशनखोरी के लिए किया जा रहा है।

कमीशनखोरी के लिए जिलों के द्वारा खरीदी की एंट्री करने में कोताही बरती जा रही है।

 

अब ऑनलाइन पोर्टल की शुरूआत :

दवा निगम के प्रबंध संचालक भुवनेश यादव जो स्वास्थ्य विभाग आयुक्त भी हैं। उन्होंने दवा खरीदी की प्रक्रिया में पारदर्शिता और समय सीमा में काम करने के लिए ड्रग प्रोक्योरमेंट एवं डिस्ट्रीब्यूशन के लिए ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया है।

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इस डीपीडीएमआईसी के पूरी तरह लागू हो जाने से स्थानीय क्रय में होने वाली गड़बड़ियों पर रोक लगेगी ऐसा स्वास्थ्य विभाग का दावा है।

इस संबंध में जब टीआरपी ने स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से जानकारी लेनी चाही तो वहां से भी जवाब नहीं आया। कई बार फोन कॉल करने पर भी अधिकारियों ने कॉल रिसिव नहीं किया।

वर्जन

ड्रग प्रोक्योरमेंट एवं डिस्ट्रीब्यूशन के लिए ऑनलाइन पोर्टल से जिलों की दवा खरीदी पर निगरानी के लिए अनिवार्य निर्देश दिए गए हैं। जिन जिलों में लापरवाही की जा रही, उन्हें डीएचएच के माध्यम से नोटिस दिया जाएगा।

टीएस सिंहदेव, मंत्री, स्वास्थ्य विभाग

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