HC shock to seven key officers of State Administrative Service, promotion stopped till further orders
राज्य प्रशासनिक सेवा के सात प्रमुख अफसरों को HC का झटका, आगामी आदेश तक रोका प्रमोशन

टीआरपी डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को बड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र में मराठों के लिए 16 फ़ीसदी आरक्षण देने के राज्य सरकार के निर्णय को निरस्त कर दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इंदिरा साहनी मामले पर फिर से विचार करने की जरूरत नहीं है। जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण देने से आरक्षण की अधिकतम सीमा (50 फ़ीसदी) को पार करती है, लिहाजा यह असंवैधानिक है।

पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ में न्यायमूर्ति अशोक भूषण के अलावा न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर, न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति एस रवीन्द्र भट भी शामिल हैं। बेंच ने 50 फीसदी आरक्षण की सीमा लांघने को समानता के मौलिक अधिकार के खिलाफ बताया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च को मराठा आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

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मराठा समुदाय को पिछड़ा करार नहीं दिया जा सकता- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि मराठाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण की सीमा को पार करने के लिए न तो गायकवाड़ आयोग और न ही हाईकोर्ट के पास कोई पुख्ता आधार था । लिहाजा हमें नही लगता कि ऐसी कोई अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हुई थी कि आरक्षण की 50 फीसदी की सीमा को लांघा जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मराठा समुदाय के लोगों को शैक्षणिक व सामाजिक रूप से पिछड़ा नहीं करार दिया जा सकता, ऐसे में उन्हें आरक्षण के दायर में लाना सही नहीं है। इससे पहले बंबई हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को आरक्षण देने के राज्य सरकार के फैसले को बरकरार रखा था। मालूम हो कि मराठा समुदाय के लोगों को आरक्षण देने के सरकार के निर्णय को कई लोग व संगठनों ने चुनौती दी थी।

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राज्य सरकार को झटका

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के आदेश की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि क्या हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की पीठ के निर्णय (मंडल कमीशन मामले) के मानने को बाध्य नहीं है, जिसमें 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मराठा आरक्षण देने से आरक्षण 73 फ़ीसदी जा पहुंची है, ऐसे में सामान्य वर्ग के लोगों के लिए अवसर बेहद कम हो गए हैं।

हाईकोर्ट ने मराठा आरक्षण को सही बताया था

2018 में महाराष्ट्र सरकार ने मराठा वर्ग को सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा में 16% आरक्षण दिया था।  बॉम्बे हाईकोर्ट में इस आरक्षण को 2 मुख्य आधारों पर चुनौती दी गई। पहला- इसके पीछे कोई उचित आधार नहीं है। इसे सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए दिया गया है। दूसरा- यह कुल आरक्षण 50% तक रखने के लिए 1992 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार फैसले का उल्लंघन करता है, लेकिन जून 2019 में हाईकोर्ट ने इस आरक्षण के पक्ष में फैसला दिया। कोर्ट ने माना कि असाधारण स्थितियों में किसी वर्ग को आरक्षण दिया जा सकता है। हालांकि, आरक्षण को घटा कर नौकरी में 13% और उच्च शिक्षा में 12% कर दिया गया।

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केंद्र सरकार ने राज्य सरकार के फैसले को सही बताया था

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मराठा समुदाय के लोगों को आरक्षण देने के राज्य सरकार के निर्णय को सही बताया था। केंद्र का कहना था कि महाराष्ट्र सरकार के पास मराठा समुदाय के लोगों को आरक्षण देने का विधायी अधिकार प्राप्त है और उसके द्वारा लिया गया यह निर्णय संवैधानिक है।