महंगाई : बेरहम सरकार का दिया एक अनचाहा तोहफा
महंगाई : बेरहम सरकार का दिया एक अनचाहा तोहफा

-श्याम वेताल

देश के कई हिस्सों में जिस तरह गर्मी का पारा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है उसी तरह पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी आसमान छू रहीं हैं। मज़े की बात यह है कि सरकार के कानों में जू नहीं रेंग रही है जबकि, बाहर देश की जनता चीख-चीख कर अपनी पीड़ा व्यक्त कर रही है।

सरकार कहती है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमत बढ़ने पर पेट्रोल -डीजल का भाव बढ़ाना हमारी मजबूरी हो जाती है।…. ठीक है, लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था परन्तु हमारे सत्ताधीशों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और कीमतें नहीं बढ़ाई गईं क्योंकि हमारे देश के पांच राज्यों में चुनाव चल रहे थे। आज अंतरराष्टीय बाज़ार में मूल्य स्थिर और कम हैं तब भी रोज कीमत बढ़ रही है।

देश की जनता यह समझना चाहती है कि आखिर क्या वजह थी कि चुनाव के समय सरकार को कोई फ़र्क़ क्यों नहीं पड़ रहा था और अब ऐसा कौन सा कारण है जो दाम बढ़ाना जरूरी हो गया है। लोगों का कहना है कि अगर चुनाव ही एकमात्र कारण है तो हर तीन महीने में चुनाव होते रहें और पेट्रोल और डीजल सस्ते बने रहें। इससे कम से कम महंगाई तो नहीं बढ़ेगी।

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आज हालात ऐसे बन गए हैं कि हर जरूरी चीज के दामों में आग लगी हुई है। पेट्रोल-डीजल के साथ ही रसोई गैस भी करीब-करीब डेढ़ सौ रुपये महंगी हो गई है। रसोई गैस के दाम इस बेरहमी से बढ़ाये जा रहें हैं , क्या इससे प्रधानमंत्री की उज्जवला योजना अपनी ही मौत नहीं मरेगी? गांव – गांव में गैस पहुंचाने चले थे। क्या ग्रामीण हजार रुपए से ऊपर का सिलेंडर खरीद सकेगा? मध्यम वर्ग को भी गैस की कीमत अखरने लगी है लेकिन, उसके पास गांव वालों की तरह लकड़ी जलाने का विकल्प नहीं है। क्या करेगा बेचारा?

पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने का असर हर वस्तु पर पड़ा है। दूध के दाम 5 रुपए तक बढ़ गए हैं। दवाओं की कीमतें काफी बढ़ा दी गईं हैं। इतना ही नहीं , रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में काम आने वाली हर चीज की कीमत बढ़ चुकी है।

आम आदमी पहले ही अपनी तमाम दुश्वारियों से पस्त है, उस पर सरकार का अपने वोटर और गरीब जनता को दिया गया यह अनचाहा तोहफ़ा — ये महंगाई। ऐसे तोहफे को देखकर हर पुरुष सरकार को भद्दी- भद्दी गालियां तक निकल रहा है और महिलाएं भी हुक्मरानों को कोस रहीं हैं। कुछ तो यह कहने से बाज नहीं आ रहीं हैं कि अगले चुनाव में वोट मांगने ये आएंगे तो झाड़ू लेकर खदेड़ेंगी।

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सच्चाई यही है कि महंगाई से हर घर का बजट बिगड़ गया है और इससे सीमित कमाई करने वाले हर गृहस्थ मानसिक रूप से परेशान हो गया है। कुछ कामगारों ने अपने काम का मूल्य यह कह कर बढ़ा दिया है कि खाने के तेल कीमत आसमान छू रहीं हैं। हम गरीब लोग सब्जी भी नहीं खा सकते। काम का पैसा बढ़ाने को मजबूर हैं। कामगारों की दलील कहाँ गलत है? सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ाने को मजबूर हो सकती है तो एक कामगार अपने काम का मूल्य बढ़ाने के लिए क्यों नहीं?