जानें क्या है स्वदेशी आंदोलन के प्रतीक चरखे का बगदाद से कनेक्शन !

टीआरपी डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को साबरमती रिवरफ्रंट पर आयोजित हुए खादी उत्सव में शामिल हुए। इस उत्सव में 7500 खादी कारीगर महिलाओं के साथ प्रधानमंत्री ने चरखा चलाया। साथ ही पीएम ने लोगों से अपने घर में खादी को जगह देने की अपील भी की। भारत में चरखे का इतिहास काफी पुराना है। बता दें कि आजादी के आंदोलन में यह चरखा ही है था जो स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बना।

जी हां महात्मा गांधी का चरखा स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जोश भरने के काम आया था। मगर क्या आप जानते हैं कि चरखे का बगदाद से कनेक्शन रहा है।

क्या है चरखे का बगदाद से कनेक्शन

भारत में चरखे की एंट्री स्वदेशी आंदोलन की शुरूआत से पहले ही हो गई थी। गूगल के आर्ट एंड कल्चर ब्लॉग की रिपोर्ट के अनुसार चरखे की उत्पत्ति 1200 CE के दौर में हुई थी। साथ ही ऐतिहासिक प्रमाण यह भी बताते हैं कि चरखे का उपयोग सबसे पहले बगदाद में किया गया था। साथ ही इसका नाम पर्शियन भाषा के शब्द चर्ख से रखा गया है। जिसका मतलब होता है चक्र यानी व्हील।

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बता दें कि 18वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति से पहले चरखे का इस्तेमाल घरों में महिलाएं कपड़ा तैयार करने में किया करती थीं। इसके बाद ही दुनिया के कई देशों में इसका इस्तेमाल हुआ। बगदाद से ही चरखा भारत और चीन पहुंचा। जहां से चरखे का प्रचार हुआ।

इस तरह चरखा बना स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक

अंग्रेजी हुकूमत को कमजोर करने के लिए महात्मा गांधी ने स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत की। इसके तहत ‘विदेशी वस्तुओं’ को अस्वीकार करना शुरू किया गया। इसी आंदोलन के दौरान ब्रिटिश कपड़ों को विरोध करते हुए स्थानीय स्तर पर बने कपड़ों के उपयोग की रणनीति बनाई गई। उस दौर में चरखे से बने कपड़े ही पहने जाने लगे। यह आंदोलन अंग्रेजी हुकूमत के लिए बड़ा झटका साबित हुआ।

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