0 पार्टी के आदिवासी नेता बनाने लगे हैं कार्यक्रमों से फासला, होने लगे हैं लामबंद…कई दिग्गज भी किनाराकश

विशेष संवादाता, रायपुर
प्रदेश भाजपा के दिग्गज नेताओं को साइड लाइन करने के बाद यहां संगठन के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की तूती बोल रही है। नए और फ्रेश चेहरों ओबीसी पॉलिटिक्स की वजह से दिग्गजों की पूछपरख काम हुई है। नतीजतन आदिवासी नेतृत्व तो नाराज़ बैठा है जूनियरों को तवज्जो देकर पार्टी फेस कहलाने वाले फायर ब्रांड लीडरों की अनदेखी से भीतरखाने में इसका असर दिखने लगा है। प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोई भी दिग्गज नहीं दिखा। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के रायपुर आगमन पर कार्यक्रम के स्वागत से लेकर रोड शो पर बोल रहे अरुण साव के ने जो जिम्मेदारी दी है वो भी भाजयुमो को। मज़े की बात यह कि वरिष्ठ साइंस कॉलेज में उद्बोधन भी नहीं देंगे। बताते हैं की सिर्फ बीजेपी सुप्रीमो जेपी नड्डा और प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव ही बोलेंगे। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के बाद विष्णुदेव साय पार्टी के कार्यक्रमों में नजर नहीं आ रहे हैं। पार्टी के प्रदेश के सबसे बड़े आदिवासी लीडर नंदकुमार साय अरसे से असंतुष्ट चल रहे हैं। इसी तरह भाजयुमो के सीएम हाउस घेराव कार्यक्रम में प्रदेश प्रभारी पुरंदेश्वरी से लेकर तमाम नेताओं की मौजूदगी रही, मगर विष्णु देव नहीं थे। भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं में नंबर दो कहलाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह रायपुर आए तब भी दोनों आदिवासी नेताओं ने दुरी बनाये राखी। बताते हैं कि पार्टी के दोनों बड़े कार्यक्रमों के दौरान साय अपने गृह क्षेत्र में थे। आमतौर पर शांत और शालीन मने जाने वाले विष्णु देव साय शांत रहे। उन्हें जब 9 अगस्त को हटाया गया, तब भी वे काफी सहज दिखे। लेकिन अब लगातार कार्यक्रमों से दुरी बनाने की खबर से अटकलें लगने लगी है कि आदिवासी नेताओं की भावनाएं आहत हुई हैं।

कयास, नंद कुमार करेंगे बिरादरी को इकट्ठा

इस बदलारव को सहजता से आदिवासी लीडर स्वीकार नहीं किये हैं। पार्टी के गैर आदिवासी नेता भी मानते हैं नाराज़गी तो हैं। पार्टी सूत्रों की मानें तो आदिवासी नेताओं की बैठकें भी हो रही हैं। पार्टी के प्रदेश के सबसे बड़े आदिवासी लीडर नंदकुमार साय तो अरसे से असंतुष्ट चल रहे हैं। वे बिरादरी को एक करने और बेबाक बयान से अपनी असंतुष्टि को झलकाते आये हैं।

ओबीसी के दिग्गज, पार्टी के अन्य भी मौन

वैसे .हाल में हुए बदलाव से सिर्फ बीजेपी के आदिवासी नेता ही नहीं बलकि ओबीसी और फायर ब्रांड नेता भी खफा हैं। मन जाये तो दिल्ली से आयातित प्रभारी नेताओं के फैसलों से बहुत ज़्यादा इत्तेफाक पार्टी के तेज़तर्राट नेता बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा भी नहीं रखते। मज़बूरी यह है कि भाजपा में अनुशासन के चलते ख़ामोशी भी है और अंदर असंतोष भी। विधानसभा में सत्तापक्ष को अपने सवालों और अनुभव से कई बार बुरी तरह घेर चुके अजय को मुख्य प्रवक्ता बनाकर दायरे में बांध दिया है।