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0 शमी इमाम
रायपुर। भानुप्रतापपुर विधानसभा का चुनाव लड़कर नया प्रयोग कर चुके “सर्व आदिवासी समाज” के नेताओं ने आगामी विधानसभा चुनाव “भारतीय ट्राइबल पार्टी” के बैनर तले लड़ने का ऐलान कर दिया है। इसी मुद्दे को लेकर रायगढ़ जिले में हुई एक बैठक में इसका फैसला किया गया। साथ ही यह भी तय किया गया कि पार्टी में SC और OBC को भी शामिल किया जायेगा और इस वर्ग से सशक्त प्रत्याशी मिला तो उसे भी चुनाव मैदान में उतारा जायेगा।

सामाजिक प्लेटफॉर्म से नहीं होगी राजनीति

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन सर्व आदिवासी समाज के दो गुट सक्रिय हैं। इनमें से एक का नेतृत्व भारत सिंह ठाकुर तो दूसरे का सोहन पोटाई करते हैं। हाल ही में भानुप्रतापपुर में संपन्न हुए विधानसभा के चुनाव में सोहन पोटाई गुट के समर्थन से प्रत्याशी अकबर राम कोर्राम को चुनाव लड़ाया गया था। चुनाव में कोर्राम की भले ही हार हुई मगर उन्होंने दोनों प्रमुख पार्टियों को कड़ी टक्कर दी। इससे सर्व आदिवासी समाज के नेता भारी उत्साहित हैं, और उन्होंने आगामी विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर लड़ने का मन बना लिया है। सोहन पोटाई के गुट वाले संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष बीएस रावटे ने TRP न्यूज़ से चर्चा में बताया कि सामाजिक प्लेटफॉर्म से राजनीति करना उचित नहीं होगा, यही वजह है कि हम लंबे समय से नई राजनितिक पार्टी बनाने पर विचार कर रहे थे।

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कुछ सीटों पर चुनाव लड़ चुकी है BTP

बीएस रावटे ने बताया कि राज्य में भाजपा और कांग्रेस दोनों की सरकारों ने आदिवासियों की उपेक्षा की है, यही वजह है कि समाज के प्रमुख लोग अलग से चुनाव लड़ने का मन बना रहे थे। उन्होंने खुलासा किया कि मूलतः गुजरात की भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) के वे काफी समय से छत्तीसगढ़ प्रदेश के प्रमुख हैं। पूर्व में इस बात पर सहमति बनी थी कि आदिवासी समाज की ओर से एक नई पार्टी का गठन किया जायेगा, मगर हमारे साथी खुलकर सामने नहीं आ रहे थे। हाल ही में आदिवासियों की उपेक्षा को लेकर सरकार से उनकी जो तनातनी हुई है, उसके बाद फ़िलहाल यह तय किया गया है कि इस बार प्रदेश की सभी विधानसभा सीटों पर भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) से प्रत्याशी मैदान में उतारे जायेंगे। इस पार्टी में आदिवासियों के अलावा अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग भी शामिल होगा।

प्रदेश में असफल रहीं दूसरी पार्टियां

बीएस रावटे ने कहा कि प्रदेश में SC -ST का प्रतिनिधित्व करने वाली बसपा और गोंगपा जैसी पार्टियां जनता के बीच पैठ नहीं जमा सकीं और धीरे-धीरे उनका अस्तित्व ख़त्म होता जा रहा है। काफी विचार-विमर्श के बाद यह तय किया गया की अब BTP के बैनर तले ST, SC और OBC को एकजुट किया जायेगा और साल भर बाद होने जा रहे चुनाव् में उनकी पार्टी दमखम के साथ लड़ेगी।

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सम्मलेन में एक प्रत्याशी भी घोषित

रायगढ़ जिले के पुसौर के बासीन पाली में भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) का प्रदेश स्तरीय सम्मलेन हुआ जिसमें भविष्य को लेकर पार्टी की रणनीति पर विचार विमर्श किया गया और यह फैसला किया गया कि पार्टी आगामी चुनाव में सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इसी मौके पर पार्टी के रायगढ़ जिलाध्यक्ष भवानी सिंह सिदार को खरसिया विधानसभा से प्रत्याशी भी घोषित कर दिया गया। पार्टी ने तय किया है कि समय से पहले सभी सीटों के लिए अपने प्रत्याशी का चयन कर लिया जायेगा।

BTP के 2 विधायक हैं राजस्थान में

भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) का उदय वैसे तो गुजरात में हुआ है, मगर वर्तमान में इसके दो विधायक राजस्थान में चुनाव जीतकर आये हैं। बता दें कि गुजरात के भरूच जिले की झघड़िया विधानसभा से कई सालों से कब्जा जमाकर रखे छोटू भाई वसावा BTP के प्रमुख हैं और हाल ही में संपन्न गुजरात के विधानसभा चुनाव में वे हार गए हैं, इस बार उनकी पार्टी से कोई भी प्रत्याशी जीत हासिल नहीं कर सका। जबकि इससे पूर्व छोटुभाई और उनके पुत्र महेश अपनी पार्टी से विधायक रहे हैं। गुजरात के अलावा मध्यप्रदेश और कुछ अन्य राज्यों सहित अब छत्तीसगढ़ में भी भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) का विस्तार हो रहा है।

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छग की 29 सीटें अजजा वर्ग के लिए आरक्षित

बता दें कि छत्तीसगढ़ राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 60.58 प्रतिशत भू-भाग अनुसूचित क्षेत्र के अन्तर्गत है। प्रदेश की कुल जनसंख्या की एक तिहाई आबादी 30.6% अनुसूचित जनजातियों की है। पांचवीं अनुसूची के तहत् छत्तीसगढ़ राज्य के 28 जिले में से 14 जिले पूर्ण रूप से अनुसूचित क्षेत्र में आते हैं, वहीं कुल 29 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ की लगभग 41 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां अनुसूचित जाति (अजा) एवं अनुसूचित जनजाति (अजजा) की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है।

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प्रदेश में बीते दो दशक में जिस तरह से आदिवासियों के लिए बनाये गए कानूनों का उल्लंघन हुआ है, उससे इस वर्ग में असंतोष स्पष्ट रूप से झलकता है। नए कल-कारखानों के चलते विस्थापन, पेशा कानून, भूमि अधिग्रहण कानून, वन अधिकार कानून का पालन कराने को लेकर विरोध और अब आरक्षण तथा धर्मान्तरण के मुद्दे ने सिर उठा लिया है। ऐसे में अगर आदिवासियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ तो आगामी विधान सभा चुनाव में तस्वीर कुछ और ही नजर आएगी।

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