कोरबा। हसदेव के जंगल को बचने के लिए इलाके के ग्रामीणों की मुहिम लम्बे समय से चल रही है। इस आंदोलन को समर्थन देने और आम एवं को जागरूक करने के लिए एक पदयात्रा बिलासपुर से शुरू की गई है, जिसकी अगुवाई इलाके के प्रसिद्द पर्यावरण कार्यकर्त्ता प्रथमेश मिश्रा कर रहे हैं।

पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से “हसदेव बचाओ आंदोलन” ने 24 नवंबर से बिलासपुर के नेहरू चौक से हरिहरपुर (सरगुजा) तक 225 किलोमीटर लंबी पदयात्रा शुरू की है। इस पदयात्रा का मुख्य उद्देश्य हसदेव नदी और जंगल के अस्तित्व को बचाने के लिए जागरूकता फैलाना और जनता को इस मुहिम में शामिल करना है।

जल श्रोत को सर्वाधिक खतरा

प्रथमेश मिश्रा ने TRP न्यूज़ से चर्चा में कहा कि हसदेव नदी का उद्गम छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के समृद्ध साल वनों से होता है, जिन्हें “मध्य भारत के फेफड़े” कहा जाता है। यह क्षेत्र न केवल छत्तीसगढ़ की पारिस्थितिकी का आधार है बल्कि लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई, बांगो डेम की जल भराव क्षमता और 120 मेगावाट बिजली उत्पादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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मिश्रा ने कहा कि पर्यावरण विशेषज्ञों और भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, हसदेव में कोयले के खनन से जंगलों का तेजी से विनाश हो रहा है। इससे बांगो डेम की जल संग्रहण क्षमता कम होने, मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने और क्षेत्र की जैव विविधता को स्थायी क्षति पहुंचने की आशंका है। उनकी पदयात्रा उन इलाकों से निकल रही है, जहां के लोग वर्तमान में हसदेव नदी और नहरों के जल से खेतीबाड़ी करते हैं।

कोरबा पहुंची पदयात्रा

बिलासपुर से 24 नवंबर को प्रारंभ हुई यह यात्रा 30 नवंबर को कोरबा पहुंच चुकी है। आगे के पड़ावों में 1 दिसंबर को जमनीपाली, 2 दिसंबर को कटघोरा, 3 दिसंबर को गुरसिया, 4 दिसंबर को चोटिया, 5 दिसंबर को केंदई, 6 दिसंबर को मदनपुर और 7 दिसंबर को हरिहरपुर पहुंचेगी। यात्रा का समापन 8 दिसंबर को हरिहरपुर में वृक्षारोपण और किसान-आदिवासी महासम्मेलन के साथ होगा। पदयात्रा के मार्ग का चयन इस प्रकार किया गया है कि बिलासपुर, जांजगीर और कोरबा जिले के उन किसानों के बीच जागरूकता फैलाई जाए, जिनको हसदेव के जंगल कटने से भविष्य में भारी नुकसान होने की आशंका है। पदयात्रा के दौरान बैठक लेकर गांवों में समितियां बनाई जा रही हैं।

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आंदोलन से जुड़े प्रथमेश ने बताया कि हसदेव जंगलों की कटाई से भविष्य में न केवल पर्यावरणीय बल्कि सामाजिक और आर्थिक नुकसान होगा। इन जंगलों के कटने से बांगो डेम में बारिश के पानी की कमी हो जाएगी, जिससे लाखों किसानों की सिंचाई पर असर पड़ेगा। इसके अलावा, हाथियों के प्राकृतिक आवास के नष्ट होने से मानव-हाथी संघर्ष और बढ़ेगा।

आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने प्रशासन और जनता से अपील की है कि इस गैर-राजनीतिक यात्रा को समर्थन दें। यह पदयात्रा पूर्णतः अनुशासित और शांतिपूर्ण रहेगी। रास्ते में आने वाले गांवों के जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने इस यात्रा को पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया है।

महासम्मेलन के दौरान हरिहरपुर में प्रतीकात्मक वृक्षारोपण और खनन से प्रभावित भूमि को मिट्टी से पाटने की योजना है। इस अवसर पर किसानों और आदिवासियों को संगठित कर पर्यावरण बचाने की शपथ दिलाई जाएगी।