अंतिम संस्कार में देरी को कोर्ट ने माना गलत, 20 दिन बाद अब दफनाया जाएगा शव

नई दिल्ली/जगदलपुर। जगदलपुर के छिंदवाड़ा गांव में 7 जनवरी को हुई पादरी की मौत के बाद शव दफनाने को लेकर विवाद हुआ था। मामला ग्राम पंचायत के बाद हाईकोर्ट पहुंचा और उसके बाद याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम पंचायत और हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए पादरी के शव को मसीही कब्रिस्तान में दफनाने का निर्णय लिया है।

क्या है पूरा मामला ?
दरअसल, बस्तर जिले के दरभा ब्लॉक के छिंदवाड़ा गांव के रहने वाले 65 वर्षीय पादरी सुभाष बघेल की 7 जनवरी को बीमारी के चलते मौत हो गई थी। इसके बाद उनके शव दफनाने के नाम पर गांव में हंगामा हो गया। गांव में पुलिस-फोर्स और प्रशासनिक अधिकारी पहुंच गए।

बढ़ते विवाद को देखते हुए उनके बेटे रमेश बघेल ने शव को जगदलपुर मेडिकल कॉलेज की मर्च्युरी में रखवा दिया। ग्राम पंचायत ने जब शव को दफनाने की अनुमति नहीं दी तो रमेश ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जहां कोर्ट ने इस घटना को दुखद बताते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने पादरी की मौत मामले में अंतिम संस्कार में देरी को गलत माना और कहा कि सालों से किसी ने ईसाई और हिंदू आदिवासियों को एक साथ दफनाने पर आपत्ति नहीं जताई, तो अचानक यह आपत्ति कैसे आ रही हैं?

मृतक के बेटे ने 20 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसपर कोर्ट ने 22 जनवरी की सुनवाई के दौरान अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। आज कोर्ट ने अपना फैसाला सुनाते हुए कहा कि पादरी का शव ईसाई कब्रिस्तान में ही दफनाया जाएगा।