कापू , धरमजयगढ। प्रदेश के शहर ही नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी सड़कों का जाल बिछ गया है, मगर ऐसे कई इलाके हैं, जो आज भी उपेक्षित हैं। विशेषकर आदिवासी अंचल, जहां विकास की बात करना बेमानी है। ऐसा ही नजारा रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ इलाके में देखने को मिलता है जहां की सड़कें कीचड़ में तब्दील हो गई हैं और यहां मरीज को गोद में उठाकर ले जाना पड़ रहा है।

तस्वीर में नजर आ रही यह सड़क धरमजयगढ़ इलाके के ग्राम कंडरजा से पंडरापाट तक जाती है। इस सड़क की हालत इतनी बदतर है कि यहां से पैदल निकलना भी कठिन हो गया है। इसी कीचड़ भरे रास्ते पर ग्राम पंचायत विजयनगर के कंडरजा मोहल्ला पटना पारा के निवासी लक्ष्मण राम राठिया अपनी बीमार पत्नी तुलसी बाई को गोद में उठाकर अस्पताल की ओर बढ़ रहे थे।

इस तरह की तस्वीर रायगढ़ जिले के सुदूर हिस्सों में हर बारिश में नजर आ जाती है। यहां न तो सड़कें सही सलामत हैं, न एंबुलेंस की पहुंच, और न ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक कोई सुगम मार्ग। बीमार व्यक्ति को अक्सर खटिया, साइकिल या गोद में उठाकर कई किलोमीटर तक ले जाना पड़ता है।

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जन प्रतिनिधियों के दावे खोखले

विकास के दावों के बीच यह हकीकत चुभने वाली है। जहां पर नेताओं और जनप्रतिनिधियों द्वारा अपने भाषणों में कहा जाता है कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास की गंगा बह रही है और अंतिम व्यक्ति तक सुविधा पहुंचाना हमारी प्राथमिकता है, लेकिन कंडरजा और मोहल्ला पटना पारा जैसे गांवों में यह गंगा सिर्फ कागजों तक ही सीमित है, जमीनी हकीकत केवल कीचड़ और लापरवाही की है। यह केवल एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि उन हजारों ग्रामीणों की व्यथा है, जो हर साल बरसात में ऐसे ही संकट से गुजरते हैं। सच्चाई यही है कि इन सुदूर गांवों में विकास का सपना अब भी दलदल में धंसा हुआ है।