टीआरपी डेस्क। दुर्ग और रायपुर के जिला उपभोक्ता फोरम ने हाल ही में रेलवे सेवा में कमी के मामलों में महत्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं, जिससे यात्रियों के अधिकारों को मजबूती मिली है।
रायपुर का मामला
पहला मामला रायपुर का है, जहां जून 2015 में राजेश जैन अपने परिवार के साथ मेंगलुरु एक्सप्रेस से मुंबई से उडुकी जा रहे थे। रात में वे अपना बैग और कपड़े सीट के नीचे रखकर सोया था। सुबह उठने पर देखा कि चूहों ने बैग और कपड़े कुतर दिए थे, जिनकी कीमत लगभग ₹14 हजार थी। ट्रेन के TTE और ऑनलाइन पोर्टल में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद राजेश जैन ने रायपुर जिला उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई में फोरम ने रेलवे को दोषी पाते हुए ₹7,000 मुआवजा और 6% ब्याज देने का आदेश सुनाया।
दुर्ग का मामला
दूसरा मामला दुर्ग का है, जहां सेक्टर-7 निवासी कुलदीप दुबे अपने परिवार के साथ 30 मई 2019 को कोरबा-यशवंतपुर एक्सप्रेस के B-1 AC कोच में यात्रा कर रहे थे। उन्होंने पत्नी और 2 बच्चों के लिए ₹4,030 का टिकट बुक कराई थी। इनमें उनकी बेटी अनुष्का दुबे दिव्यांग है और उसे मिर्गी की बीमारी है। यात्रा के दौरान AC खराब हो गया, जिससे परिवार को गर्मी और परेशानी का सामना करना पड़ा। कुलदीप दुबे ने इस समस्या की शिकायत गोंदिया स्टेशन पर दर्ज कराई, लेकिन रेलवे स्टाफ ने AC को सही बताते हुए कोई सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की।
निराश होकर कुलदीप दुबे ने 20 जुलाई 2020 को SECR के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में केस दायर किया, जिसमें टिकट की राशि के साथ ₹2 लाख मानसिक क्षति का दावा किया। सुनवाई के दौरान रेलवे ने अपना पक्ष रखा, लेकिन प्रस्तुत दस्तावेज गलत ट्रेन नंबर से जुड़े थे, जिससे उनका तर्क खारिज हो गया। अंततः फोरम ने रेलवे को सेवा में कमी और व्यावसायिक दुराचरण का दोषी मानते हुए परिवार को ₹20 हजार मुआवजा देने का आदेश दिया। यह दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के इतिहास में संभवतः पहली बार है जब ऐसी स्थिति में रेलवे दोषी पाया गया।
शिकायत के लिए उपभोक्ता फोरम सबसे सही
इन दोनों मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यात्रियों को यात्रा के दौरान मिलने वाली सुविधाओं में कमी, लापरवाही या सुरक्षा में चूक के मामले में उपभोक्ता फोरम का सहारा लेना चाहिए। फिलहाल रायपुर जिला उपभोक्ता फोरम में रेलवे से संबंधित 50 मामले लंबित हैं, जो आने वाले समय में नजीर बन सकते हैं।
ऐसे फैसले न केवल यात्रियों के अधिकारों को मजबूत करते हैं, बल्कि रेल प्रशासन को अपनी सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए भी बाध्य करते हैं। उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत, किसी भी यात्री को यात्रा के दौरान दावे के अनुसार सेवा न मिलने पर शिकायत दर्ज करने और मुआवजा प्राप्त करने का अधिकार है।



