टीआरपी डेस्कअध्यात्म। हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष का खास महत्व होता है। इसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। जिसमें अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध या तर्पण किया जाता है। कहा जाता है, ऐसा करने से मृत पूर्वजों को मुक्ति या मोक्ष की प्राप्ति होती है। हर साल पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद मास की पूर्णिमा से होती है। आइए जानते है, कब से शुरू है पितृपक्ष।
कब से शुरू हैं पितृपक्ष
हर साल पितृपक्ष की शुरूआत भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू और आश्विन मास की अमावस्या को समाप्त होते है। यह 15 दिन तक चलते है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, इस साल पितृपक्ष 7 सितंबर से शुरू और 21 सितंबर को समापन हो जायेगें।
क्या है महत्व
पुराणों के मुताबिक, मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते है ताकि वह अपने स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सके। ऐसा माना जाता है कि जो लोग अपने पूर्वजों को श्राद्ध पक्ष में तर्पण अर्पित करते है तो उनके पूर्वज प्रसन्न होते है और आशीर्वाद देते है। ताकि उसके कुल में सुख-शांति बनी रहे।
श्राद्ध किस आधार पर किया जाता है?
मान्यता के अनुसार, श्राद्ध कर्म मृत्यु तिथि के आधार पर किया जाता है। यानी जिस दिन व्यक्ति की मृत्यु हुई थी, पितृ पक्ष पर उसी दिन उसका श्राद्ध किया जाता है। अगर किसी को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि याद नहीं हैं, तो ऐसे में वे अमावस्या के दिन यानी सर्वपितृ श्राद्ध कर सकते हैं।
पितृ पक्ष की तिथियां
ऽ पूर्णिमा श्राद्ध- 07सितम्बर 2025, रविवार
ऽ प्रतिपदा श्राद्ध- 08 सितम्बर 2025, सोमवार
ऽ दितीया श्राद्ध- 09 सितम्बर 2025, मंगलवार
ऽ तृतीया श्राद्ध- 10 सितम्बर 2025, बुधवार
ऽ चतुर्थी श्राद्ध- 10 सितम्बर 2025, बुधवार
ऽ पचंमी श्राद्ध- 11 सितम्बर 2025, गुरूवार
ऽ षष्ठी श्राद्ध- 12 सितम्बर 2025, शुक्रवार
ऽ सप्तमी श्राद्ध-13 सितम्बर 2025,शनिवार
ऽ अष्टमी श्राद्ध-14 सितम्बर 2025, रविवार
ऽ नवमी श्राद्ध- 15 सितम्बर 2025, सोमवार
ऽ दशमी श्राद्ध- 16 सितम्बर 2025, मंगलवार
ऽ एकादशी श्राद्ध- 17 सितम्बर 2025, बुधवार
ऽ द्वादशी श्राद्ध- 18 सितम्बर 2025, गुरूवार
ऽ त्रयोदशी श्राद्ध- 19 सितम्बर 2025, शुक्रवार
ऽ चतुर्दशी श्राद्ध- 20 सितम्बर 2025, शनिवार
ऽ सर्वपितृ अमावस्या- 21 सितम्बर 2025, रविवार
पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध कैसे करें
ऽ श्राद्ध वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और घर की साफ-सफाई कर, पूरे घर में गंगाजल को छिड़कें।
ऽ इसके बाद मुंह को दक्षिण दिशा में करके बाएं पैर को मोड़कर और बाएं घुटने को जमीन पर टीका कर बैठ जाएं।
ऽ फिर तांबे के पात्र में काले तिल, गाय का कच्चा दूध और गंगाजल पानी डालें।
ऽ जल को दोनों हाथों में भरकर सीधे हाथ के अंगूठे से उसी पात्र में गिराएं और इस दौरान पितरों का स्मरण करें।
ऽ पितरों के लिए भोजन तैयार करें।
ऽ श्राद्ध के लिए घर पर ब्राम्हण को बुलाएं, उनके पैर धोएं और सच्चे भाव से उन्हें भोजन कराएं।
ऽ खास बात यह कि ब्राम्हण को भोजन कराने से पहले पंचबली यानी कौवे, गाय, कुत्ते, देवता और चींटी को भोजन अवश्य निकालें। यह एक महत्वपूर्ण परंपरा है।
ऽ पितरों के लिए उनका पसंदीदा यानी जो पहले खाना पसंद करते थे वह अवश्य अर्पित करें।
ऽ ब्राम्हणों को भोजन कराने के बाद दान अवश्य करें और आशीर्वाद लें।



