टीआरपी डेस्क। हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन के खिलाफ दायर याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने सरगुजा जिले के उदयपुर तहसील स्थित ग्राम घठबार्रा के निवासियों की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ग्रामीणों के सामुदायिक वन अधिकारों का कोई ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत के अनुसार ग्रामसभा की 2008 और 2011 की बैठकों में केवल व्यक्तिगत भूमि अधिकारों पर चर्चा हुई थी, सामुदायिक अधिकारों से जुड़ा कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था।

यह मामला हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति और जयनंदन सिंह पोर्ते द्वारा दायर याचिका से संबंधित था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 2016 में जिला समिति ने ग्राम घठबार्रा के सामुदायिक वन अधिकारों को अवैध रूप से रद्द कर दिया। साथ ही याचिकाकर्ताओं ने 2022 में फेज-2 कोल ब्लाक खनन की मंजूरी को भी चुनौती दी थी, यह कहते हुए कि ग्रामसभा की सहमति के बिना अनुमति देना कानून का उल्लंघन है।

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राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजकुमार गुप्ता ने तर्क दिया कि हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति कोई वैधानिक संस्था नहीं है और इसलिए वह ग्रामसभा या ग्रामीणों की ओर से सामुदायिक अधिकार का दावा नहीं कर सकती। वहीं राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. निर्मल शुक्ला ने कहा कि कोल ब्लाक का आवंटन संसद द्वारा पारित कोल माइंस (स्पेशल प्रोविजन) एक्ट, 2015 के तहत हुआ है, जो अन्य सभी कानूनों पर प्राथमिकता रखता है। इसलिए वन अधिकार कानून की धाराएं इस मामले में बाधक नहीं हैं।

न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद केंद्र और राज्य सरकार के वर्ष 2012 और 2022 के आदेशों को सही ठहराया। अदालत ने माना कि पारसा ईस्ट एवं केते बासन (पीईकेबी) कोल ब्लाक के फेज-1 और फेज-2 में खनन के लिए आवश्यक सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है। ग्रामसभा के रिकॉर्ड में सामुदायिक वन अधिकार से संबंधित कोई प्रमाण नहीं मिला, इसलिए जिला समिति द्वारा 2016 में सामुदायिक अधिकारों को रद्द करने का निर्णय उचित ठहराया गया।

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