बिलासपुर। धमतरी जिले में पुलिस कस्टडी में आरोपी की मौत का जिम्मेदार हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को ठहराया है। घटना मार्च 2025 की है। जहां धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार आरोपी युवक की मौत पुलिस कस्टडी में मौत हो गई थी। कोर्ट ने पुलिस अभिरक्षा में मौत पर सख्त टिप्पणी करते हुए पीड़ित परिवार को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश राज्य शासन को दिया है। कोर्ट ने गृह विभाग के सचिव को आदेश दिया कि वे व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित करें कि मुआवजे की राशि समय पर दी जाए। कोर्टने 8 सप्ताह का डेडलाइन तय किया है।

‘मुआवजा केवल राहत नहीं’

डिवीजन बेंच ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हर हिरासत में मौत राज्य की जवाबदेही पर सवाल उठाती है। मुआवजा केवल राहत नहीं, बल्कि ऐसे अमानवीय कृत्यों की पुनरावृत्ति रोकने का माध्यम है।

हाई कोर्ट ने हिरासत में मौत को राज्य सरकार की जिम्मेदारी मानते हुए मृतक की पत्नी को 3 लाख और माता-पिता को 1-1 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह पुलिस की बर्बरता और हिरासत में ज्यादती का परिणाम है। यह सीधेतौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकारों का हनन है।

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कोर्ट में पेश करने के 3 घंटे बाद हुई मौत

घटना धमतरी जिले के अर्जुनी थाने की है। राजनांदगांव निवासी दुर्मेंद्र कठोलिया (41 साल) को 29 मार्च 2025 को पुलिस ने धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया था। 31 मार्च को शाम 5 बजे उसे धमतरी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। इस दौरान वह पूरी तरह स्वस्थ था। सिर्फ तीन घंटे बाद रात 8 बजे पुलिस हिरासत में उसकी मौत हो गई। पुलिस हिरासत में पति की मौत पर पत्नी दुर्गा देवी कठोलिया, मां सुशीला और पिता लक्ष्मण सोनकर ने दोषियों पर उचित कार्रवाई समेत मुआवजा देने की मांग को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

शरीर पर मिले 24 जख्मों के निशान

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि जब दुर्मेन्द्र को कोर्ट में पेश किया गया, वह पूरी तरह स्वस्थ था। शाम 5 बजे उन्हें फिर से थाने में रखा गया, जहां कुछ ही घंटों में उसकी मौत हो गई। परिजन का आरोप है कि पुलिस ने हिरासत में मारपीट की,जिससे दुर्मेंद्र की मौत हो गई।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर पर 24 पूर्व-मृत्यु चोटों का जिक्र किया गया है। हाथ, छाती, जांघ, घुटनों, चेहरे और नाक पर चोट के निशान थे। मेडिकल बोर्ड ने बताया कि उसकी मौत दम घुटने से हुई, जिससे कार्डियो रेस्पिरेटरी अरेस्ट हुआ।

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पुलिस ने बीमारी का बनाया बहाना

पुलिस ने परिवार को बताया कि दुर्गेद्र बीमार पड़ गया था, उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया हैं, लेकिन बाद में पता चला कि उनकी पहले ही मौत हो चुकी थी। शव मिलने पर परिवार ने शरीर पर चोटों के निशान देखकर हंगामा किया और उच्चाधिकारियों से शिकायत की।

सरकार ने चोटों को बताया पुराना

राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए विधि अधिकारी ने बताया कि मौत प्राकृतिक कारणों से हुई और चोटें साधारण व पुरानी थीं। चीफ जस्टिस की बेंच ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि पुलिस हिरासत में महज तीन घंटे के भीतर मौत होना असाधारण है। चोटें साधारण हों या गंभीर, पुरानी हों या नई राज्य अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।

‘यह कस्टोडियल बर्बरता का उदाहरण’

मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने कहा कि सभी साक्ष्यों से स्पष्ट है कि यह मौत पुलिस की यातना से हुई है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और सम्मान के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

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कोर्ट ने कहा कि मौत के हालात यह दिखाते हैं कि मृतक को अमानवीय यातना दी गई थी। यह मामला कस्टोडियल बर्बरता का उदाहरण है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हिरासत में मौत के मामलों में मुआवजा देना सार्वजनिक कानून के तहत जरूरी उपाय है।

डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि, मृतक की पत्नी दुर्गा देवी को 3 लाख की राशि दी जाए, ताकि वह और उनके दो नाबालिग बच्चों की देखभाल कर सकें।

मृतक के माता-पिता को प्रत्येक एक लाख दिए जाएं। यह भुगतान 8 हफ्ते के अंदर किया जाए, अन्यथा राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा।

सरकार को दी ये नसीहत

बेंच ने अपने फैसले में कहा कि ऐसी घटनाएं जनता के भरोसे को तोड़ती हैं। राज्य को अपने पुलिसबल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाना होगा और डीके बसु केस में तय दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हर हिरासत में मौत राज्य की जवाबदेही पर सवाल उठाती है। मुआवजा केवल राहत नहीं, बल्कि ऐसे अमानवीय कृत्यों की पुनरावृत्ति रोकने का माध्यम है।