टीआरपी। Annakut festival celebrated in temples on Govardhan Puja : इस वर्ष अमावस्या तिथि दो दिन होने के चलते दो दिनों तक दीपावली का पर्व श्रद्धा उल्लास से मनाया गया। दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि पर गोवर्धन पूजा की धूम रही। एक ओर जहां घर घर में महिलाओं ने गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर पूजन किया और पर्वत की परिक्रमा की। ब्रज क्षेत्र में गोवर्धन पर्वत की सात कोस की परिक्रमा करने की मान्यता है। इसी परंपरा का संक्षिप्त पालन करते हुए घर-घर में गोबर से बनाए गए पर्वत की सात परिक्रमा लगाई। इसी तरह राजधानी के अनेक मंदिरों में पूजा करके भगवान के श्रीविग्रह के समक्ष 56 व्यंजनों का भोग लगाया गया। दोपहर बाद अन्नकूट का प्रसाद वितरण किया गया।

नृसिंह मंदिर में 256 व्यंजनों का भोग

ब्रम्हपुरी स्थित 1100 वर्ष प्राचीन भगवान नृसिंह एवं विरंचीनारायण मंदिर में 256 व्यंजनों का भोग लगाया गया। सुबह विधिवत पूजन करके भगवान को भोग अर्पित किया गया। मंदिर के महंत देवदास ने बताया कि मंदिर में शुद्ध देशी घी से व्यंजन बनाए गए। इसके अलावा श्रद्धालु भी अपने घर पर अपने हाथों से व्यंजन बनाकर लाए और भगवान को भोग लगाया। मंदिर में दोपहर बाद भोजन प्रसादी का आयोजन किया गया।

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दूधाधारी मठ

400 वर्ष से अधिक प्राचीन मठपारा स्थित दूधाधारी मठ में महंत रामसुंदर दास के मार्गदर्शन में राघवेंद्र सरकार यानी श्रीराम-सीता, भरत, शत्रुघ्न, हनुमानजी और बालाजी की पूजा की गई। मठ की गोशाला में गोमाता का पूजन करके और गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर पूजन करने की परंपरा निभाई।

जैतूसाव मठ

इसी तरह पुरानी बस्ती में 200 वर्ष प्राचीन जैतूसाव मठ में भी 56 भोग अर्पित करके महाआरती की गई। मठ में मालपुआ का प्रसाद सहित विविध व्यंजनों का भोग अर्पित किया गया।

खाटू श्याम मंदिर

समता कालोनी स्थित खाटू श्याम मंदिर में खाटू वाले श्यामबाबा का सफेद फूलों से मनमोहक श्रृंगार करके 56 भोग अर्पित किया गया। इनके अलावा जगन्नाथ मंदिर, गुढ़ियारी के हनुमान मंदिर, सत्ती बाजार स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर, सदरबाजार के गोपाल मंदिर, बूढ़ापारा के गोकुल चंद्रमा मंदिर, चूड़ी लाइन के बांके बिहारी मंदिर, समता कालोनी के राधाकृष्ण मंदिर, टाटीबंध के इस्कान मंदिर सहित अनेक मंदिरों में 56 भोग अर्पित किया गया।

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द्वापर युग में शुरू हुई अन्नकूट की परंपरा

ऐसी मान्यता है कि द्वापर युग में बृज क्षेत्र के वासी भगवान इंद्रदेव की पूजा करते थे। श्रीकृष्ण ने गांववासियों को समझाया कि गोवर्धन पर्वत से सभी जीवों को शुद्ध वायु, जल, अन्न की प्राप्ति होती है, गोमाता, पर्वत पर ही घास, चारा चरने जातीं है। इसलिए गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाए। इससे इंद्रदेव कूपित हो गए। इंद्रदेव ने ब्रज क्षेत्र में घनघोर बारिश की। ग्रामीणों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को धारणकर इंद्र के अभिमान को तोड़ा।

यह भी मान्यता है कि सात दिनों तक घरघोर बारिश हुई। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाए रखा। इंद्रदेव को ज्ञात हुआ कि भगवान विष्णु ने ही श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया है। इंद्र ने क्षमा मांगी। इसके बाद माता यशोदा एवं ब्रज क्षेत्र के लोगों ने विविध व्यंजन तैयार किया। गोवर्धन पर्वत को विविध व्यंजनों का भोग लगाकर सुख, समृद्धि की प्रार्थना की। तबसे, प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर अन्नकूट महोत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई।

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इन व्यंजनों का लगाया भोग


लड्डू, शाक सब्जी, शरबत, बाटी, मुरब्बा, दधि, जलेबी, रसगुल्ला, घेवर, मालपुआ, भात, दाल, दलिया, फल, तांबूल, मोहनभोग, कढ़ी, मक्खन, मोठ, खीर, पूरी, सीरा, लस्सी, गोघृत, मलाई, चटनी, बड़ा, मठरी सहित दूध, खोवा, मेवा से निर्मित अनेक व्यंजनों का भोग लगाया गया।