टीआरपी डेस्क। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीआर गवई ने कहा कि, न्याय किसी विशेष वर्ग का विशेषाधिकार नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। वे राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के कानूनी सहायता वितरण तंत्र को मजबूत करने पर आयोजित सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
न्यायमूर्ति गवई ने न्यायाधीशों, वकीलों और कानूनी अधिकारियों से आग्रह किया कि समाज के हाशिए पर जीवन यापन करने वाले लोगों तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि संस्थानों की सफलता का वास्तविक मापदंड आंकड़ों में नहीं बल्कि आम नागरिक के विश्वास में निहित है।
मणिपुर की यात्रा का जिक्र करते हुए सीजेआई ने बताया कि चुराचांदपुर के राहत शिविर में एक बुजुर्ग महिला ने आंसुओं के साथ हाथ जोड़कर कहा था, बने रहो भैया। यह पल उन्हें बार-बार याद दिलाता है कि विधिक सेवा आंदोलन का सच्चा पुरस्कार वार्षिक रिपोर्टों में नहीं बल्कि जरूरतमंदों के जीवन में बदलाव में है।
महात्मा गांधी के ताबीज का उल्लेख करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कोई भी निर्णय लेते समय सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करना चाहिए तथा यह पूछना चाहिए कि क्या उठाया जा रहा कदम उसके जीवन को बेहतर बनाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधिक सेवा आंदोलन इसी सिद्धांत का जीवंत रूप है।
न्यायमूर्ति गवई ने जोर दिया कि न्याय का प्रकाश समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। यह आंदोलन गांधीजी के उस नैतिक दिशासूचक का साकार रूप है जो हमें निरंतर सही दिशा दिखाता रहेगा।



