टीआरपी। Unsung freedom fighter – Ram Krishna Tiwari : आजादी के बाद जब हम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का स्मरण करते है तो हमें प्रेरणा मिलती है। शहीदों के त्याग, बलिदान एवं एक-एक स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों का योगदान ऐतिहासिक एवं अविस्मरणीय रहा है। देश के लाखो वीरों ने अपनी सहभागिता राष्ट्रहित हेतु कर्तव्य एवं दायित्व के अनुकूल निर्वहन किया। शासन की सूची बनी। कई सेनानी संग्रामी अंजान बने रहे हैं, जिनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता। ऐसे ही सेनानियों में से एक राम कृष्ण तिवाड़ी भी रहे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और देश को आजादी दिलाने वालों में अहम सेनानी रहे। 78 वर्ष पूर्व 30 नवंबर 1948 को वे पंचतत्व में विलीन हुए।

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध इतिहासकार डा.रमेंद्र नाथ मिश्र बताते हैं कि स्वातंत्र्य संघर्ष में अंग्रेजों के राज से मुक्त कराने हेतु अनगिनत लोगों ने अपना सर्वस्व त्याग किया, बलिदान दिया। इनमें से एक, रायपुर छत्तीसगढ़ के सेनानी रामकृष्ण तिवाड़ी का योगदान भी अविस्मरणीय है। वे यहाँ प्रवासी थे। मूलतः उनका परिवार बीकानेर से यहांँ आया था।

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वे गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित हुए। उन्होंने रायपुर अंचल के आंदोलन में सक्रिय रहे सेवादल में सम्मिलित होकर एक समिति गठित की, जिसके माध्यम से अंग्रेजो की अन्यायपूर्ण गतिविधियों का विरोध करना, उन्हें परेशान करना – उन युवकों का उद्देश्य था। वे उस समय के छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों महंत लक्ष्मी नारायण दास, यति यतन लाल, पण्डित रविशंकर शुक्ल, ठाकुर प्यारे लाल सिंह,वामन राव लाखे, शिवदास डागा, खूबचंद बघेल के साथ रहे।

26 जनवरी 1930 को मनाया था स्वतंत्रता दिवस

इतिहासकार डा.मिश्र बताते हैं कि 26 जनवरी 1930 को उन्होंने अपने साथियों के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाया और तिरंगा झंडा फहराया। पंडित रविशंकर शुक्ल के निवास पर 3 फरवरी 1930 को दांडी यात्रा की जानकारी साथियो को दी एवं आंदोलन में सहभागिता हेतु बैठक में विचार विमर्श कर, उसके कार्यान्वयन में सम्मिलित रहे, जिससे रायपुर में दांडी यात्रा की गूंज सुनाई दे। यही हमें जंगल सत्याग्रह के रूप में दिखाई दिया। क्योंकि, अंग्रेजों द्वारा बनाए कानून को तोड़ना था। चाहे नमक बनाकर हो या वन कानून का उल्लंघन हो। रायपुर में राष्ट्रीय सप्ताह मनाया गया। नयापारा विद्यालय में सत्याग्रह आश्रम तथा उद्योग मंदिर की स्थापना की गई।

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गांवों में जगाई आजादी की अलख

रायपुर अंचल में खरोरा ग्राम गनियारी गांव जाकर अध्यापन के माध्यम से ग्राम्यांचल के लोगों को जागृत किया। राष्ट्रीय आंदोलन में सहभागिता हेतु उन्हें प्रेरित किया। यतियतन लाल के साथ भी इस प्रकार की यात्रा में महासमुंद अंचल में सहभागी रहे। 1937 में सप्रे विद्यालय के परिसर में सेवादल के बालक से लेकर वयोवृद्ध लोगों के साथ एक समूह चित्र जनकवि सुरेंद्र रघुनाथ मिश्र सुरता छत्तीसगढ़ छवि अन्वेषक संस्थान रायपुर में सुरक्षित है। जिसमें 14 वर्षीय मोतीलाल त्रिपाठी, वरिष्ठ वामन राव लाखे, शिवदास डागा, पण्डित रविशंकर शुक्ल, महंत लक्ष्मी नारायण दास, महंत वैष्णव दास, डॉक्टर खूबचंद बघेल एवं युवा शुक्ल बंधु दृष्टिगत हो रहे हैं। वे संगीत प्रेमी थे, यह गुण, उनके पुत्र, लोकजीवन के कवि गोपालकृष्ण तिवाड़ी में विकसित हुए थे। इन्हीं गुणों के चलते, वे कलकत्ता महानगर में खासे लोकप्रिय हुए।

गांधीजी के कार्यों के साक्षी

महात्मा गांधी 22 से 28 नवम्बर 1933 के मध्य रायपुर में रहे। बुढ़ापारा शुक्ल भवन उनका निवास स्थान था, जहां पर उनका चबूतरा गांधी चबूतरा के रूप में बना हुआ है; वहीं पर सेनानी युवक भी उपस्थित रहते थे। सदर बाजार, सप्रे विद्यालय, मोतीबाग, गांधी चौक में वे गांधीजी के कार्यों के साक्षी रहे। उन्होंने आर्थिक स्थिति की परवाह नहीं की विदेशी वस्तुओं की होली में शादी के लिए रखी नई साड़ियाँ होली में समर्पित कर दिया।

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1930 से 1947 तक निरंतर स्वतंत्रता संग्राम में वे सक्रिय रहे। पुलिसिया व्यवहार उनकी मार से वे टूट चुके थे। पेट में घाव हो गया था। 30 नवंबर 1948 को देश के इस राष्ट्रभक्त ने आजादी की बलिवेदी पर प्राण न्यौछावर कर दिया सार्वजनिक सम्मान से उनका संस्कार हुआ।