टीआरपी डेस्क। दुनिया भर में असामान्य मौसमी घटनाओं का दौर जारी है। ज्वालामुखी विस्फोट, चक्रवाती तूफान से बाढ़ और असहनीय गर्मी जैसी आपदाएं बढ़ रही हैं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, यह क्वासी-बायनियल ऑसिलेशन (QBO) का असामान्य टूटना है, जो धरती से 20-30 किलोमीटर ऊपर स्ट्रेटोस्फियर में बहने वाली हवाओं की दिशा का पलटाव है। सामान्यतः 28-30 महीने में पूर्वी-पश्चिमी दिशा बदलने वाली यह धारा नवंबर 2025 में ही उलट गई, जबकि यह जनवरी-फरवरी में होता है।
अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिमी हवाएं पूर्वी दिशा में तेजी से बदल रही हैं, जो सामान्य से 2-3 महीने पहले है। इससे ला नीना प्रभावित होगा, जो नवंबर 2025 से फरवरी 2026 तक सक्रिय रहेगा। QBO का यह विघटन तूफानों को अनियमित बनाता है, नमी असामान्य स्थानों पर गिरती है तथा चरम घटनाएं (बाढ़, सूखा, लू) क्लस्टर में आती हैं।
वैश्विक प्रभाव
समुद्री सतह का रिकॉर्ड तापमान (हिंद महासागर और पश्चिमी प्रशांत में 2-3°C ऊपर) ऊपरी हवाओं को अस्थिर कर रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया (वियतनाम, इंडोनेशिया, फिलीपींस) में भयंकर बाढ़ और तूफान जारी हैं। यूरोप में अत्यधिक ठंडी सर्दी, उसके बाद बाढ़ से फसलें बर्बाद होंगी तथा ऊर्जा संकट गहराएगा। अमेरिका के कैलिफोर्निया में हफ्तों वर्षा से बाढ़-भूस्खलन, ऑस्ट्रेलिया में रिकॉर्ड बाढ़-सूखा तथा सऊदी अरब में अनियमित बारिश से तेल उत्पादन बाधित होगा। इनसे प्रभावित देशों की जीडीपी में 1-2% गिरावट संभव है। QBO का सीधा संबंध ज्वालामुखी या भूकंप से नहीं, लेकिन मौसम से भूगर्भीय दबाव बदलता है। जलवायु परिवर्तन इन घटनाओं को जोड़ रहा है।
मानव स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव लू से डिहाइड्रेशन-हीट स्ट्रोक, बाढ़ से डूबना तथा ठंड से हाइपोथर्मिया है। अप्रत्यक्ष रूप से मलेरिया-डेंगू जैसी बीमारियां, डिप्रेशन तथा हृदय रोग बढ़ेंगे। बुजुर्ग और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होंगे।
भारत पर असर
भारत, हिंद महासागर और प्रशांत के बीच स्थित होने से सीधे प्रभावित होगा। 2025-26 में अनियमित मॉनसून से कृषि 10-20% प्रभावित, खाद्य महंगाई बढ़ेगी तथा जीडीपी में 0.5-1% गिरावट संभव है। रबी फसलें (गेहूं, चना) देरी से पकेंगी, पंजाब-हरियाणा-यूपी में गेहूं उत्पादन 10-20% कम। खरीफ 2026 में धान-मक्का प्रभावित। बागवानी (सेब, आम) पर भी मार।
उत्तर-पूर्वी मॉनसून (अक्टूबर-दिसंबर 2025): सामान्य से 20-30% अधिक बारिश, 2-3 शक्तिशाली चक्रवात। चेन्नई, विशाखापट्टनम जैसे तटीय शहरों में भयंकर बाढ़ का खतरा।
सर्दी (दिसंबर 2025-फरवरी 2026): ला नीना से 2-4°C कम तापमान, लेकिन QBO से अनियमित। दिसंबर-जनवरी में कोल्ड वेव, घना कोहरा 10-15 दिन। हिमाचल-उत्तराखंड में भारी बर्फबारी-हिमस्खलन। फरवरी में अचानक 5-7°C वृद्धि।
गर्मी (मार्च-मई 2026): रिकॉर्ड तोड़ लू, मध्य भारत में 48-50°C। 15-20 दिन भीषण गर्मी, सूखा। हीटवेव से मौतें बढ़ेंगी।
दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (जून-सितंबर 2026): देरी से आगमन (जुलाई पहला हफ्ता), जुलाई-अगस्त में 110-120% बारिश। कुछ क्षेत्रों में बाढ़, अन्य में सूखा। कुल अनियमित और विनाशकारी।
विशेषज्ञ मत
मौसम विज्ञानी के मुताबिक, ” मौसमी आपदाएं ग्लोबल पैटर्न से जुड़ी हैं। लो प्रेशर सिस्टम हाई प्रेशर को खींचेगा, साइबेरियन विंड्स से ठंड बढ़ेगी। ला नीना हिमालय से नीचे चलेगी, बर्फबारी अधिक। हिंद महासागर 1°C गर्म से नमी बढ़ी, कंपाउंड एक्सट्रीम वेदर (संयुक्त चरम) पैदा करेगा। “जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर भी देखने को मिलेगा। QBO के प्रभाव से तापमान 0.7°C बढ़ा, लू की तीव्रता-अवधि बढ़ी है। 2030 तक दक्षिण एशिया के 90% लोग हीटवेव की चपेट में होंगे। मॉनसून बेकाबू रहेगा। हालात ऐसे हो जाएंगे कि, अगर बाढ़ से एक जिला प्रभावित है, तो दूसरा दूसरा हिस्सा बारिश के लिए तरसेगा। ऐसे में असामान्य गर्मी बढ़ेगी। फसलों पर भी इसका असर पड़ेगा। ऐसे में गेहूं-चावल उत्पादन 30-50% गिर सकता है। AMOC से बर्फीले तूफान बढ़ेंगे।यह बदलाव जलवायु मशीन का बड़ा फ्रैक्चर है, जो हर घर-खेत-शहर को प्रभावित करेगा। आने वाले 12 महीने भारत के लिए सबसे कठिन होंगे।


