नई दिल्ली। रुपये में गिरावट का सिलसिला जारी है। मंगलवार, 16 दिसंबर को रुपया पहली बार डॉलर के मुकाबले 91 के स्तर को पार कर गया। कारोबार के अंत में रुपया 23 पैसे टूटकर 91.01 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह लगातार दूसरा दिन है जब रुपये ने ऑल टाइम लो बनाया है।

अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर बनी अनिश्चितता और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली से रुपये पर दबाव बना हुआ है। साल 2025 में अब तक रुपया करीब 6 प्रतिशत कमजोर हो चुका है। 1 जनवरी को रुपया 85.72 प्रति डॉलर पर था, जो अब 90.87 के स्तर से नीचे फिसल चुका है।

आम लोगों पर असर

रुपये की कमजोरी का सीधा असर आयात पर पड़ता है। विदेश से आने वाला सामान महंगा होता है। इसके साथ ही विदेश यात्रा और विदेश में पढ़ाई का खर्च भी बढ़ जाता है। उदाहरण के तौर पर, पहले 1 डॉलर के लिए 50 रुपये खर्च होते थे, अब उसी 1 डॉलर के लिए 91 रुपये देने पड़ रहे हैं। इससे विदेश में पढ़ने वाले छात्रों की फीस, रहने और खाने का खर्च काफी बढ़ गया है।

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रुपये में गिरावट की तीन बड़ी वजहें

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारतीय आयात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने से भारत के निर्यात पर दबाव है। इससे विदेशी मुद्रा की आमद घटने और GDP ग्रोथ पर असर की आशंका है।

जुलाई 2025 से अब तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजार से 1.55 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की निकासी की है। बिकवाली के बाद डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया कमजोर हो रहा है।

कच्चे तेल और सोने की ऊंची कीमतों के कारण आयातक डॉलर की खरीद बढ़ा रहे हैं। टैरिफ को लेकर अनिश्चितता के चलते कंपनियां डॉलर स्टॉक कर रही हैं, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव है।

RBI का सीमित दखल

LKP सिक्योरिटीज के वीपी रिसर्च एनालिस्ट जतिन त्रिवेदी के मुताबिक, भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर स्पष्टता न होने से रुपये में तेज बिकवाली देखने को मिली है। मेटल और गोल्ड की रिकॉर्ड कीमतों ने आयात बिल बढ़ाया है, जबकि ऊंचे टैरिफ से निर्यात की प्रतिस्पर्धा कमजोर हुई है। इस दौरान RBI का हस्तक्षेप भी सीमित रहा, जिससे गिरावट तेज हुई।

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शुक्रवार को आने वाली RBI की मौद्रिक नीति पर बाजार की नजर है। उम्मीद की जा रही है कि सेंट्रल बैंक रुपये को स्थिर करने के लिए कदम उठा सकता है। तकनीकी तौर पर रुपया ओवरसोल्ड जोन में पहुंच चुका है।

कैसे तय होती है करेंसी की कीमत

डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट को मुद्रा का कमजोर होना कहा जाता है। किसी भी देश की करेंसी पर उसके विदेशी मुद्रा भंडार का सीधा असर पड़ता है। अगर फॉरेन रिजर्व मजबूत होता है तो करेंसी स्थिर रहती है। डॉलर की उपलब्धता घटने पर रुपया कमजोर होता है और भंडार बढ़ने पर रुपये में मजबूती आती है।