एआई समिट (AI Impact Summit 2026) में टेक्नोलॉजी से ज्यादा ट्रेंडिंग रहा गलगोटिया यूनिवर्सिटी का खोज। जिसकी खूब चर्चाएं हो रही है। दरअसल गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीनी रोबोडॉग को अपनी खोज बताया। यह खबर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गई। जिसके बाद लोगों ने यूनिवर्सिटी की जमकर आलोचना की।

इसी बीच, यूनिवर्सिटी का एक पुराना शोधपत्र भी सामने आया है। रिसर्च का विषय था-“थाली और घंटी बजाकर कोरोना वायरस मारा जा सकता है!” यह लेख मार्च-अगस्त 2020 के एक जर्नल में प्रकाशित हुआ था। जिसमें तर्क दिया गया था कि विशिष्ट साउंड वाइब्रेशंस (ध्वनि कंपन) के माध्यम से वायरस को खत्म किया जा सकता है। उस समय दुनिया कोविड से जूझ रही थी और एब्सट्रैक्ट में लिखा गया था कि कोई स्पेशल वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। सपोर्टिव थेरपी के तौर पर ‘साउंड वाइब्रेशन’ से वायरस खत्म होने की उम्मीद जताई गई थी।

अब जैसे ही यह पुराना पेपर वायरल हुआ, सोशल मीडिया पर लोगों ने वैज्ञानिक तरंगों की नई व्याख्या शुरू कर दी। मजेदार बात यह कि यह रिसर्च अब ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है। पब्लिशर ने इसे हटाते हुए कहा कि यह पेपर पाठकों को भ्रमित कर रहा था और वैज्ञानिक समुदाय में गलत संदेश जा रहा था। बाद में लेखक, एडिटर और संबंधित स्टाफ पर कार्रवाई की भी खबरें आई थीं।

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पब्लिशर ने ‘भ्रामक’ बताकर हटाया था लेख
विवाद बढ़ने पर पब्लिशर ने इस लेख को ऑनलाइन पोर्टल से हटा दिया है। पब्लिशर ने स्पष्ट किया कि यह पेपर वैज्ञानिक समुदाय को भ्रमित करने वाला था। इस मामले में लेखक, संपादक और जिम्मेदार स्टाफ पर पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है। अब रोबोडॉग विवाद के बाद नेटिजन्स इस पुराने पेपर को शेयर कर यूनिवर्सिटी की अकादमिक गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे हैं।

भारत मंडपम में क्या हुआ?
यूनिवर्सिटी ने यूनिट्री (Unitree) कंपनी के चीनी रोबोट Go2 को अपना बताकर एआई समिट में पेश किया था। मामला तब बढ़ा जब इसके वीडियो चीनी सोशल मीडिया हैंडल्स तक पहुँच गए और यूनिवर्सिटी की पोल खुल गई। इसके बाद अधिकारियों ने कड़ा रुख अपनाते हुए भारत मंडपम से यूनिवर्सिटी का स्टॉल हटवा दिया।