जनकपुर में बैगा समाज द्वारा निकारि प्रथा का आयोजन।

टीआरपी डेस्क।  छत्तीसगढ़ के नवगठित जिले मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB) के आदिवासी बहुल विकासखंड भरतपुर अंतर्गत जनकपुर क्षेत्र में आज भी सदियों पुरानी लोक परंपराएं पूरी आस्था के साथ निभाई जा रही हैं। होली पर्व की शुरुआत से ठीक पहले यहां बैगा समाज द्वारा पारंपरिक ‘निकारि’ प्रथा संपन्न की गई, जिसे लेकर ग्रामीणों में अटूट विश्वास है।

यह परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि जनकपुर और आसपास के ग्रामीण इलाकों की सामूहिक एकजुटता का प्रतीक है। ग्रामीणों का मानना है कि इस अनुष्ठान के बिना गांव में अनिष्ट की आशंका बनी रहती है, इसलिए नई पीढ़ी भी इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में जुटी है।

आपदा और महामारी से संरक्षण की है मान्यता

जनकपुर निवासी पुजारी गरीबा मौर्य ने बताया कि जब से यह क्षेत्र बसा है, तब से बैगा समाज इस प्रथा का निर्वहन कर रहा है। होली के पूर्व ‘डांग गढ़ने’ से पहले इस विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। गरीबा मौर्य स्वयं वर्ष 2006 से ठाकुर बाबा की सेवा करते हुए इस जिम्मेदारी को संभाल रहे हैं।

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इस प्रथा का मुख्य उद्देश्य गांव को हैजा, कॉलरा और अन्य किसी भी प्रकार की महामारी या दैवीय आपदा से सुरक्षित रखना है। अनुष्ठान के दौरान नकारात्मक शक्तियों को गांव की सीमा से बाहर खदेड़ने की प्रार्थना की जाती है।

सीमा पार छोड़ी जाती है मुर्गी: अनूठी है प्रक्रिया

निकारि प्रथा की प्रक्रिया अत्यंत अनूठी और पारंपरिक है

  • मुर्गी चराई: परंपरा के अनुसार बैगा द्वारा पूरे गांव में मुर्गी चराई जाती है।
  • चौक-चौराहों पर पूजा: गांव के हर मुख्य चौक और तिराहे पर विशेष मंत्रोच्चार के साथ प्रक्रिया पूरी की जाती है।
  • नकारात्मकता का निष्कासन: अंत में उस मुर्गी को गांव की सीमा और नदी के उस पार छोड़ दिया जाता है। मान्यता है कि गांव की सारी बलाएं और बीमारियां उस मुर्गी के साथ सीमा पार चली जाती हैं।

इस कार्य में गांव के हर टोले-मोहल्ले के लोग हिस्सा लेते हैं और बैगा को अखत (चावल), झाड़ू व पूजन सामग्री भेंट करते हैं।

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