Bastar Fighters Game Changer: छत्तीसगढ़ के बस्तर में अब हवा का रुख बदल चुका है। पिछले दो दशकों से जो इलाके नक्सलियों के अभेद्य किले माने जाते थे, आज वहां सुरक्षा बलों के बूटों की धमक सुनाई दे रही है। लेकिन इस बार सबसे बड़ी चोट बाहर से आई फोर्स ने नहीं, बल्कि इसी मिट्टी के बेटों बस्तर फाइटर्स ने की है। सुकमा और बीजापुर के घने जंगलों से आ रही खबरें बता रही हैं कि नक्सलवाद के सफाए की उल्टी गिनती अब शुरू हो चुकी है।
जब रक्षक बने जंगल के जानकार
दरअसल, नक्सली अब तक इसलिए बचते रहे क्योंकि उन्हें घने जंगलों, छिपी हुई पगडंडियों और स्थानीय भाषा का फायदा मिलता था। द रूरल प्रेस को सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, बस्तर फाइटर्स की तैनाती ने नक्सलियों का यही सबसे बड़ा हथियार छीन लिया है। बीजापुर और सुकमा के उन कोर एरिया में, जहां जीपीएस (GPS) भी फेल हो जाता है, वहां ये फाइटर्स बिना किसी नक्शे के नक्सलियों के छिपने के ठिकानों (Dumps) तक पहुंच रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि नक्सलियों का जो इंटेलिजेंस नेटवर्क गांवों में फैला था, उसे बस्तर फाइटर्स ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। वर्दी में खड़ा जवान जब गोंडी या हल्बी में ग्रामीणों से बात करता है, तो सूचनाओं का ऐसा प्रवाह शुरू होता है जिसे रोकना नक्सलियों के बस के बाहर हो गया है।
बजट 2026 की 1500 नई भर्तियां
बता दें कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 24 फरवरी को पेश हुए बजट 2026-27 में 1,500 नए बस्तर फाइटर्स की भर्ती का जो ऐलान किया है, वह सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं बल्कि नक्सलवाद के ताबूत में आखिरी कील है। आईजी पी. सुंदरराज ने अपनी हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट संकेत दिए हैं कि पुना नारकोम (नई सुबह) अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि धरातल पर दिखने वाला सच है।
सुकमा-बीजापुर के सरहदी इलाकों में हाल ही में हुई मुठभेड़ों ने साबित कर दिया है कि बस्तर फाइटर्स की ग्राउंड नेविगेशन क्षमता की वजह से अब फोर्स को अंधेरे में तीर नहीं चलाना पड़ रहा। वे सीधे नक्सलियों के उस सेफ हाउस पर प्रहार कर रहे हैं जहां कभी फोर्स के पहुंचने की कल्पना भी नहीं की गई थी।
क्या बस्तर से मिट जाएगा नक्सलवाद का दाग?
गृह मंत्रालय द्वारा तय की गई 31 मार्च 2026 की डेडलाइन अब नक्सलियों के लिए किसी डरावने सपने जैसी है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर फाइटर्स की वजह से जो लोकल प्रेशर बना है, उससे नक्सली कैडर में भगदड़ मच गई है। बाहरी लीडरशिप और स्थानीय कैडर के बीच भरोसा पूरी तरह टूट चुका है।
प्रशासन का संदेश अब चौराहों और हाट-बाजारों में गूंज रहा है हथियार डालो या बस्तर फाइटर्स का सामना करो। बीजापुर की गलियों से लेकर सुकमा के सुदूर गांवों तक अब एक ही चर्चा है कि इस बार दिवाली से पहले ही बस्तर में शांति का दीया जलने वाला है।


