टीआरपी डेस्क। संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा को लेकर अक्सर लोगों के मन में यह सवाल होता है कि आखिर जनता के वोट न डालने के बावजूद यहां सदस्य कैसे पहुंचते हैं? दरअसल, यह पूरी प्रक्रिया एक तय फॉर्मूले पर आधारित है।

कैसे होता है चुनाव?

राज्यसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा नहीं, बल्कि राज्य विधानसभाओं के विधायकों द्वारा चुने जाते हैं। इसे ‘अप्रत्यक्ष चुनाव’ कहते हैं। इसमें ‘एकल संक्रमणीय मत प्रणाली’ (Single Transferable Vote) का उपयोग होता है। विधायक अपने मतपत्र पर उम्मीदवारों के नाम के आगे 1, 2, 3 जैसी प्राथमिकताएं (Preference) लिखते हैं।

कितने वोटों की होती है जरूरत?

राज्यसभा में जीत का आंकड़ा पहले से तय होता है। इसके लिए एक खास गणित है। सबसे पहले राज्य की कुल विधानसभा सीटों की संख्या को राज्यसभा की सीटों में 1 जोड़कर (जैसे 5+1=6) भाग दिया जाता है। जो संख्या आती है, उसमें फिर 1 जोड़ दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी सीट के लिए 41 वोटों की दरकार है, तो उम्मीदवार को कम से कम उतने वोट पहली प्राथमिकता में हासिल करने होंगे। अगर पहली बार में कोई नहीं जीतता, तो दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती होती है।

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क्यों कभी भंग नहीं होती राज्यसभा?

लोकसभा के उलट, राज्यसभा एक स्थायी सदन है। इसका कारण यह है कि इसके सभी सदस्य एक साथ रिटायर नहीं होते। राज्यसभा के सांसदों का कार्यकाल 6 साल का होता है। हर दो साल में इसके एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त (रिटायर) हो जाते हैं, और उनकी जगह नए सदस्य चुनकर आते हैं। इसी कारण यह सदन कभी खत्म नहीं होता और अपना काम लगातार करता रहता है।

26 सदस्य निर्विरोध क्यों चुने गए?

इस बार की सियासी तस्वीर देखें तो देश भर में 37 सीटों के लिए चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई थी। मैदानी सूत्रों के अनुसार, कई राज्यों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सहमति बनी या विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं था। जब मैदान में सीटों की संख्या के बराबर ही उम्मीदवार बचते हैं, तो उन्हें निर्विरोध (Unopposed) चुन लिया जाता है। इस बार ऐसे ही 26 दिग्गज नेता बिना वोटिंग के ही सदन में पहुंच गए हैं।

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