टीआरपी डेस्क। आज से शक्ति की उपासना का महापर्व वासंती नवरात्रि शुरू हो गया है। इसके साथ ही भारतीय काल गणना के अनुसार विक्रम संवत का नया साल भी प्रारंभ हो गया है। बता दें कि चैत्र प्रतिपदा, जिसे हम चैत्र की पड़वा या प्रथमा भी कहते हैं, केवल एक तिथि नहीं बल्कि ग्रहों और नक्षत्रों की सटीक चाल पर आधारित नववर्ष का पहला दिन है।

कलश स्थापना: क्यों है यह इतना खास?

नवरात्रि की पूजा में कलश स्थापना का सबसे अधिक महत्व है। गौरतलब है कि कलश को मंगलकारी भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, कलश स्थापना के बिना शक्ति की पूजा अधूरी मानी जाती है। कलश में भरा गया शुद्ध जल या गंगाजल क्षीरसागर का प्रतीक है, जो जीवन में शीतलता लाता है। कलश पर रखा नारियल या कोई भी गोल फल महादेव शिव का स्वरूप माना जाता है। कलश के नीचे बोए गए जौ इस बात का संकेत देते हैं कि आने वाला साल खेती और सुख-समृद्धि के लिहाज से कैसा रहेगा।

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कैसा होना चाहिए आपका कलश?

जानकारों की मानें तो कलश हमेशा सोना, चांदी, तांबा या पीतल का होना चाहिए। अगर ये उपलब्ध न हों, तो मिट्टी का कोरा कलश सबसे उत्तम माना जाता है। ध्यान रहे कि कलश कहीं से खंडित न हो। कलश के मुख पर कलावा (मौली) बांधना और उस पर स्वास्तिक बनाना अत्यंत शुभ होता है।

ग्रह शांति के लिए आज का दिन है वरदान

चैत्र प्रतिपदा यानी साल के पहले दिन ग्रह शांति के उपाय करना बहुत फलदायी होता है। दरअसल, विक्रम संवत की गणना पूरी तरह वैज्ञानिक है। इस दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप ‘मां शैलपुत्री’ की पूजा के साथ-साथ अगर आप दान-पुण्य करते हैं, तो पूरे वर्ष ग्रहों की स्थिति आपके अनुकूल बनी रहती है।