Bengal Assembly Elections: नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए गठबंधन ने हलचल तेज कर दी है। असदुद्दीन ओवैसी ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन आगामी विधानसभा चुनाव हुमायूं कबीर की नवगठित आम जनता उन्नयन पार्टी के साथ मिलकर लड़ेगी। ओवैसी के इस हैदराबादी दांव से राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए परेशानी बढ़ गई ​​है।

Bengal Assembly Elections: TMC के मुस्लिम वोटबैंक में सेंध

ओवैसी ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी इस गठबंधन के तहत चुनाव मैदान में उतरेगी और “गरीबों व वंचितों की आवाज” को मजबूत करेगी। उन्होंने राज्य में पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र रद्द होने जैसे मुद्दों को उठाते हुए सरकार पर सवाल खड़े किए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ बंगाल के पारंपरिक ‘मुस्लिम वोटबैंक’ में सेंध लगाने की रणनीति का हिस्सा है, जो अब तक बड़े पैमाने पर TMC के साथ रहा है।

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हाल ही में पार्टी बनाकर सुर्खियों में आए हुमायूं कबीर ने गठबंधन को जमीन पर उतारते हुए तेज शुरुआत की है। मुर्शिदाबाद के रेजीनगर स्थित कार्यालय से उन्होंने 153 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है। पहले 182 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना थी, लेकिन फिलहाल 153 नामों पर मुहर लगाई गई है। इस कदम ने राज्य के चुनावी समीकरणों को और पेचीदा बना दिया है।

Bengal Assembly Elections: TMC के लिए क्यों बढ़ी चिंता

पश्चिम बंगाल में लगभग 27 से 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और 294 में से 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में इसका प्रभाव और अधिक है। अब तक यह वोट बड़े पैमाने पर TMC के पक्ष में जाता रहा है, लेकिन नए गठबंधन से इसमें बिखराव की आशंका जताई जा रही है। जानकारों के मुताबिक, अगर यह गठबंधन सीमित वोट भी काटता है, तो कई सीटों पर परिणाम बदल सकते हैं।

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Bengal Assembly Elections: हाई-प्रोफाइल सीटों पर त्रिकोणी मुकाबला

गठबंधन ने सियासी मुकाबले को और तीखा बनाते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भवानीपुर सीट और विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी की नंदीग्राम सीट पर भी उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है। हालांकि इन सीटों के लिए नामों का खुलासा अभी नहीं किया गया है, लेकिन इसे शीर्ष नेताओं को उनके ही गढ़ में घेरने की रणनीति माना जा रहा है।

ओवैसी और कबीर का यह गठबंधन सिर्फ एक चुनावी प्रयोग नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन बदलने की कोशिश है। आने वाले चुनावों में यह देखना अहम होगा कि यह हैदराबादी दांव से TMC अपने मजबूत किले को ​कैसे बचाती है।