Kalinga University: रायपुर/मनेन्द्रगढ़। कलिंगा विश्वविद्यालय द्वारा “भारतीय न्याय संहिता (BNS) एवं आपराधिक न्याय प्रणाली में इसके व्यावहारिक प्रभाव” विषय पर एक सेमिनार का आयोजन 24 मार्च 2026 को सत्र न्यायालय, मनेन्द्रगढ़ में किया गया। यह कार्यक्रम न्यायालय परिसर में आयोजित किया गया, जिसमें अधिवक्ता संघ, मनेन्द्रगढ़ का सराहनीय सहयोग प्राप्त हुआ, जिन्होंने आयोजन एवं संचालन में सक्रिय भूमिका निभाई।

सेमिनार में बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं की सक्रिय भागीदारी रही तथा कार्यक्रम की गरिमा अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष सूर्य प्रकाश सिंह, उपाध्यक्ष उत्तम कुमार सिंह, उपाध्यक्ष मीना सिंह एवं संयुक्त सचिव नेत्रा बिंदु झा की उपस्थिति से बढ़ी। उनकी उपस्थिति ने विधि समुदाय के सशक्त संस्थागत समर्थन को दर्शाया। विशेषज्ञ सत्र का संचालन चितिका मल्होत्रा, सहायक प्राध्यापक, विधि संकाय द्वारा किया गया।

विशेषज्ञ सत्र में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रमुख प्रावधानों, भारतीय दंड संहिता (IPC) से इसके संरचनात्मक बदलाव, नए जोड़े गए अपराधों, संशोधित परिभाषाओं तथा आपराधिक कानून के अभ्यास पर इसके प्रभाव पर विस्तृत प्रकाश डाला। सत्र में प्रावधानों की व्याख्या, सहायक कानूनों के साथ प्रक्रियात्मक समन्वय तथा IPC से BNS में परिवर्तन के दौरान अधिवक्ताओं के समक्ष आने वाली चुनौतियों जैसे व्यावहारिक पहलुओं पर भी चर्चा की गई।

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हाल ही में BNS के क्रियान्वयन और भारत में आपराधिक कानून के विकसित होते ढांचे को ध्यान में रखते हुए, इस चर्चा में अद्यतन विधिक प्रावधानों, न्यायिक व्याख्याओं तथा उनके न्यायालयीन कार्यवाही में उपयोग को समझने के महत्व पर बल दिया गया। साथ ही, प्रभावी पैरवी और न्याय वितरण सुनिश्चित करने हेतु विधि पेशेवरों के लिए इन सुधारों से अद्यतन रहने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

कार्यक्रम में परिवार न्यायालय के न्यायाधीशों, विशेष न्यायाधीशों, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों एवं सिविल न्यायाधीशों सहित न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्यों की गरिमामयी उपस्थिति भी रही, जो विधि के विकसित होते क्षेत्रों में निरंतर अधिगम और क्षमता निर्माण के प्रति न्यायपालिका के सक्रिय दृष्टिकोण को दर्शाती है।

Kalinga University: बार और बेंच के सदस्यों से सराहा

कलिंगा विश्वविद्यालय निरंतर ऐसे प्रयास करता रहा है, जो शैक्षणिक संस्थानों और न्यायपालिका के बीच सार्थक संवाद को बढ़ावा देते हैं, जिससे विधि शिक्षा और न्यायिक कार्यप्रणाली के बीच एक रचनात्मक समन्वय स्थापित हो सके। बार और बेंच के सदस्यों से प्राप्त सकारात्मक प्रतिक्रिया से उत्साहित होकर, विश्वविद्यालय अब छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिला न्यायालयों में इस प्रकार के और भी केंद्रित कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रहा है, ताकि विधि अध्ययन और न्यायालयीन व्यवहार के बीच संबंध को और सुदृढ़ किया जा सके।

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