बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर जिला अस्पताल के भोजन आपूर्ति के लिए आमंत्रित 60 लाख रुपये के टेंडर को रद्द करते हुए एक महिला स्व-सहायता समूह के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि सरकारी अफसरों की कार्रवाई मनमानी है और यह संविधान के अनुच्छेद 14-समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
इस मामले में याचिकाकर्ता जशपुर के जंगल बाजार में ‘गढ़ कलेवा’ नाम से रेस्टोरेंट संचालित करने वाला एक महिला स्व-सहायता समूह है, जो एक पंजीकृत सूक्ष्म या लघु उद्यम (एमएसएमई) भी है।
याचिका के अनुसार, 19 फरवरी को जिला अस्पताल जशपुर के सिविल सर्जन-सह-मुख्य अस्पताल अधीक्षक ने जेम पोर्टल पर एक वर्ष के लिए भोजन आपूर्ति का टेंडर जारी किया था। इसमें 60 हजार रुपये की जमानत राशि और पिछले तीन वर्षों में न्यूनतम 50 लाख रुपये के औसत वार्षिक टर्नओवर की शर्त रखी गई थी।
हालांकि, टेंडर दस्तावेज में यह भी स्पष्ट था कि एमएसएमई मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार एमएसई इकाइयों को अनुभव और टर्नओवर जैसी शर्तों में पूर्ण छूट दी जाएगी, बशर्ते वे गुणवत्ता और तकनीकी मानकों को पूरा करें। इसके बावजूद 30 मार्च को याचिकाकर्ता समूह का टेंडर केवल टर्नओवर मानदंड पूरा न करने के आधार पर खारिज कर दिया गया।
याचिका में यह भी बताया गया कि बालोद जिला अस्पताल के समान टेंडर में न्यूनतम टर्नओवर केवल 15 लाख रुपये रखा गया था, जबकि जशपुर में इसे बिना किसी ठोस आधार के बढ़ाकर 50 लाख कर दिया गया। अदालत में यह भी तर्क दिया गया कि संबंधित समूह को वर्ष 2024-25 के लिए पहले इसी तरह का ठेका दिया गया था, जिसे बिना नोटिस और सुनवाई के अचानक रद्द कर दिया गया था। उस कार्रवाई को भी हाईकोर्ट पहले निरस्त कर चुका है।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि पूरी टेंडर प्रक्रिया नियमों और शर्तों के अनुसार पारदर्शी तरीके से की गई है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने टेंडर को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने की ये टिप्पणी
अदालत ने कहा कि सार्वजनिक खरीद में राज्य और उसके संस्थानों को निष्पक्ष, पारदर्शी और भेदभावरहित तरीके से कार्य करना चाहिए। किसी भी प्रकार का विचलन, जो किसी बोलीदाता को नुकसान पहुंचाता है, कानून में स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने पूरी टेंडर प्रक्रिया अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया।



