टीआरपी डेस्क। भारतीय रेलवे की लंबी यात्रा में आज हम जिस टॉयलेट सुविधा को अपना अधिकार मानते हैं वह हमेशा से रेल डिब्बों का हिस्सा नहीं थी। हैरानी की बात यह है कि देश में पहली यात्री ट्रेन चलने के करीब 55 साल बाद तक आम यात्रियों को शौच के लिए अगले स्टेशन आने का बेसब्री से इंतजार करना पड़ता था। सफर के दौरान पेट पकड़कर बैठे रहने की इस मज़बूरी को खत्म करने के पीछे किसी बड़े इंजीनियर का दिमाग नहीं बल्कि एक साधारण यात्री की सरेराह हुई बेइज्जती और उसका गुस्से में लिखा गया एक खत था।
लोटा लेकर भागे और छूट गई ट्रेन
साल 1909 की एक दोपहर ओखिल चंद्र सेन नामक यात्री पश्चिम बंगाल के अहमदपुर स्टेशन पर उतरे ताकि अपनी कुदरती हाजत पूरी कर सकें। अभी वह फारिग भी नहीं हुए थे कि गार्ड ने सीटी बजा दी और ट्रेन रेंगने लगी। ओखिल चंद्र को एक हाथ में लोटा और दूसरे में धोती संभालते हुए ट्रेन के पीछे भागना पड़ा लेकिन वह उसे पकड़ नहीं पाए और स्टेशन पर खड़े लोगों के सामने उन्हें शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। इसी अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने साहिबगंज रेल डिवीजन को अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में एक ऐसा पत्र लिखा जिसने रेलवे के नियमों की नींव हिला दी।
अजायबघर की शान बना वो शिकायती खत
ओखिल चंद्र ने अपने खत में साफ लिखा कि रेलवे की लापरवाही की वजह से उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित होना पड़ा और उनकी ट्रेन छूट गई। इस शिकायत ने ब्रिटिश अधिकारियों को सोचने पर मजबूर कर दिया जिसके बाद फैसला हुआ कि 80 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करने वाली हर ट्रेन के लोअर क्लास डिब्बे में टॉयलेट अनिवार्य रूप से बनाए जाएंगे। आज ओखिल चंद्र सेन का वह ऐतिहासिक खत नई दिल्ली के नेशनल रेल म्यूजियम में संभालकर रखा गया है जो हर यात्री को याद दिलाता है कि कभी-कभी एक लोटा और एक धोती भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।


