बिलासपुर हाईकोर्ट भवन की बाहरी तस्वीर और कानूनी न्याय का प्रतीक
बिलासपुर हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार कानून के तहत जुर्माने की प्रक्रिया पर बड़ा आदेश जारी किया है।

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आवारा मवेशियों और गौठानों की बदहाल स्थिति को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के दावों पर सवाल उठाए। दरअसल सरकार ने अदालत में हलफनामा पेश कर कहा है कि प्रदेश की गौशालाओं में चारा, पानी और पशुओं के रहने की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध है। इस पर मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने पूछा कि यदि सारी व्यवस्थाएं संतोषजनक हैं, तो सड़कों पर घूमने वाले मवेशियों की संख्या कम क्यों नहीं हो रही है।

25 एकड़ का गौठान बनाया है सरकार ने

सरकार ने अदालत को बताया कि बिलासपुर के लाखासार स्थित सुरभि गौठान 25 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है, जहां पशुओं के लिए तीन बड़े शेड बनाए गए हैं। पशुओं के चारे के लिए पांच एकड़ भूमि में नेपियर घास की खेती की जा रही है और परिसर में तीन बोरवेल भी चालू हालत में हैं। हलफनामे में उस आरोप का भी खंडन किया गया, जिसमें कहा गया था कि गौठान में 205 मवेशियों को एक छोटे कमरे में बंद रखा गया था।

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राज्य सरकार ने यह भी जानकारी दी कि प्रदेश में कुल 142 पंजीकृत गौशालाएं संचालित हैं, जिनमें लगभग 39 हजार मवेशियों को रखा गया है। हालांकि कोर्ट ने केवल सरकारी जवाब के आधार पर मामले को समाप्त करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि बार-बार यह स्थिति सामने आ रही है कि गौठानों के निर्माण के बावजूद बड़ी संख्या में मवेशी सार्वजनिक सड़कों पर घूमते नजर आते हैं। इससे स्पष्ट है कि जिम्मेदार एजेंसियों की व्यवस्था अभी भी पर्याप्त नहीं है।

सुनवाई के दौरान हाल ही में रायपुर रोड राष्ट्रीय राजमार्ग पर मवेशियों के झुंड दिखाई देने की घटना का भी उल्लेख किया गया। कोर्ट ने इसे सड़क सुरक्षा और प्रशासनिक लापरवाही से जुड़ा गंभीर विषय माना।

सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि 7 नवंबर 2025 के आदेश के बाद विशेष नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। इन अधिकारियों को जिला प्रशासन और पशुपालन विभाग के बीच समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी दी गई है, ताकि छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 के तहत जब्त और आवारा मवेशियों के उचित प्रबंधन की निगरानी हो सके।

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इसके अलावा जिला प्रशासन को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि गौशालाओं में रखे गए पशुओं को केवल आश्रय ही नहीं, बल्कि आवश्यक सुविधाएं भी मिलें। जवाबदेही तय करने के लिए पशुपालन विभाग के संचालक को हर महीने प्रगति रिपोर्ट भेजना अनिवार्य किया गया है। मामले की अगली सुनवाई अब जुलाई 2026 में होगी।