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High Court grants major relief to women excluded from police recruitment

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में एसीबी को बड़ा झटका दिया है। सबूतों के अभाव में तत्कालीन सहायक संचालक (शिक्षा) अनिल मारकंडे और लिपिक रमेश कुमार चौहान को बरी कर दिया गया। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने बेमेतरा विशेष न्यायालय के 8 सितंबर 2017 के फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें दोनों को 3-3 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी।

क्या था पूरा मामला?

अक्टूबर 2010 में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी शिक्षाकर्मी पत्नी का रुका वेतन जारी करने के बदले 5,000 रुपये की रिश्वत मांगी गई। एसीबी ने ट्रैप कार्रवाई कर सहायक संचालक अनिल मारकंडे की जेब से रासायनिक पाउडर लगे नोट बरामद किये थे। दोनों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(डी) के तहत केस चला था।

रिकॉर्डिंग में निकलीं गंभीर खामियां

हाईकोर्ट ने पाया कि रिश्वत मांगने के सबूत के तौर पर पेश आवाज की रिकॉर्डिंग में कई खामियां थीं। शिकायतकर्ता ने माना कि रिकॉर्डिंग वाला उपकरण 5 से 10 अक्टूबर 2010 तक उसके घर पर ही रहा, बाद में एसीबी को दिया। इससे छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। न तो आरोपियों और न ही शिकायतकर्ता के वॉयस सैंपल लिए गए। रिकॉर्डिंग की विशेषज्ञ से जांच नहीं कराई गई और न ही वैज्ञानिक सत्यापन हुआ। ट्रांसक्रिप्ट भी शिकायतकर्ता की मदद से बनी। गवाहों ने कहा कि रिकॉर्डिंग में कई आवाजें थीं और बातचीत स्पष्ट नहीं थी।

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इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का प्रमाणपत्र भी नहीं

कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत जरूरी प्रमाणपत्र भी पेश नहीं किया गया, इसलिए रिकॉर्डिंग विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती। सह-आरोपी रमेश कुमार चौहान की मौके पर मौजूदगी साबित नहीं हुई और न ही उससे कोई रकम बरामद हुई।

शिकायत से पहले ही मिल गया था वेतन

फैसले में यह भी आया कि शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी ने माना कि उन्हें 5 अक्टूबर 2010 को ही वेतन का चेक मिल गया था, जबकि ट्रैप कार्रवाई बाद में हुई। कोर्ट ने शिकायतकर्ता के आचरण को संदिग्ध बताया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ रिश्वत की रकम बरामद होना दोषसिद्धि के लिए काफी नहीं है। अभियोजन को रिश्वत मांगने और स्वीकार करने दोनों को संदेह से परे साबित करना होता है। ACB पूरी श्रृंखला साबित करने में विफल रही, इसलिए दोनों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया।

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