छत्तीसगढ़ में मदरसा बोर्ड को समाप्त कर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाने की मांग उठी।

टीआरपी। छत्तीसगढ़ में संचालित मदरसा बोर्ड को समाप्त कर उसके स्थान पर उत्तराखंड की तर्ज पर ‘छत्तीसगढ़ अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन करने की मांग तेज हो गई है। इस संबंध में छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डा.सलीमराज ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखकर राज्य के मदरसों को आधुनिक शिक्षा और मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कड़े कदम उठाने का आग्रह किया गया है।

छत्तीसगढ़ के मदरसों में पढ़ रहे हजारों मुस्लिम छात्र वर्तमान में आधुनिक और व्यावसायिक शिक्षा से दूर हैं। यदि सरकार इस प्रस्ताव पर मुहर लगाती है, तो राज्य की मदरसा शिक्षा प्रणाली में बड़ा बदलाव आएगा और छात्रों को दीनी तालीम के साथ-साथ कंप्यूटर व वैज्ञानिक शिक्षा मिलने का रास्ता साफ होगा।

उत्तराखंड मॉडल पर मदरसों को मुख्यधारा से जोड़ने की तैयारी

मुख्यमंत्री को सौंपे गए पत्र में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम 2025 का हवाला दिया गया है, जिसके तहत वहां 1 जुलाई से मदरसा शिक्षा परिषद को समाप्त कर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया गया है। पत्र में कहा गया है कि केंद्र और राज्य सरकार का उद्देश्य होना चाहिए कि मदरसे के छात्र के एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में कंप्यूटर हो, ताकि वे केवल मौलवी न बनकर डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक भी बन सकें।

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वर्तमान में छत्तीसगढ़ के मदरसों को राज्य शासन से प्रतिवर्ष अनुदान मिलता है, लेकिन आधुनिक शिक्षा के अभाव में इसका समुचित लाभ अल्पसंख्यक समुदाय को नहीं मिल पा रहा है। प्रस्ताव में मांग की गई है कि इन मदरसों को विद्यालयी शिक्षा परिषद से जोड़ा जाए और पाठ्यक्रम के लिए एक विशेष कमेटी बनाई जाए, जो धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों का समावेश तय करे ताकि छात्रों का स्किल डेवलपमेंट हो सके।

छत्तीसगढ़ में वर्तमान में लगभग 418 मदरसे संचालित हैं, जिनमें से कई मदरसे पूरी तरह छात्रविहीन हैं या सिर्फ प्राथमिक स्तर की दीनी शिक्षा दे रहे हैं।
उत्तराखंड शासन ने 8 अक्टूबर 2025 को राजपत्र में प्रकाशन कर अपने राज्य में इस नए अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण मॉडल को कानूनी रूप से लागू किया है।

इस पत्र के बाद राज्य सरकार मदरसों के सर्वे और पाठ्यक्रम सुधार को लेकर कोई बड़ा नीतिगत फैसला ले सकती है, जिस पर आने वाले दिनों में सियासी और सामाजिक बहस छिड़ना तय है।