Bijapur। छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले का ग्राम पंचायत पीड़िया, जिसे नक्सलवाद का गढ़ और नक्सलियों की “यूनिवर्सिटी” कहा जाता था, आज विकास की नई इबारत लिख रहा है। सालों तक सुरक्षा कारणों से शासन-प्रशासन की पहुंच से दूर रहे इस गांव में अब कच्चे रास्ते बनने और हालात सामान्य होने के बाद सरकारी योजनाएं दस्तक दे रही हैं।

Bijapur: 31 मार्च 2026 के बाद बदली हुई परिस्थितियों ने पीड़िया की तस्वीर बदल दी है । अब यहां प्रशासन की नियमित पहुंच संभव हो पाई है और इसी कड़ी में गांव में पहली बार विशेष आधार नामांकन एवं अद्यतन शिविर का आयोजन किया गया। यह शिविर सिर्फ कागज बनाने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि दशकों से विकास से कटे इस गांव को मुख्यधारा से जोड़ने की शुरुआत थी। 

पहचान से शुरू हुई विकास की यात्रा: दूरस्थ और नेटवर्कविहीन क्षेत्र होने के बावजूद शिविर में ग्रामीणों का उत्साह देखते ही बनता था। तहसीलदार गंगालूर भोजराम डहरिया और नायब तहसीलदार बीजापुर रवेन्द्र सिन्हा के मार्गदर्शन में लगे इस शिविर में बड़ी संख्या में महिला, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे अपने जरूरी दस्तावेजों के साथ पहुंचे। तकनीकी दिक्कतों के बावजूद 80 ग्रामीणों का आधार पंजीयन और अद्यतन का काम सफलतापूर्वक किया गया। अब ये लोग पेंशन, राशन, स्वास्थ्य और अन्य सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ ले सकेंगे।

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Bijapur: स्थानीय लोगों का कहना है कि आधार बनने से अब उन्हें अपनी पहचान मिली है। वर्षों तक जो लोग सरकारी योजनाओं से वंचित थे, अब उनके लिए दरवाजे खुल गए हैं।

नक्सल गढ़ से शांति का गांव बना पीड़िया के बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि एक समय पीड़िया नक्सली गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। बड़े-बड़े नक्सली नेता यहां प्रशिक्षण के लिए आते थे। गांव में दहशत का माहौल रहता था और सरकारी अमला यहां आने की हिम्मत नहीं करता था। लेकिन आज वही गांव हिंसा को पीछे छोड़कर शांति और विकास की राह पर चल पड़ा है। ग्रामीणों ने बताया कि अब वे सामान्य जीवन जी रहे हैं और उन्हें शासन की योजनाओं का लाभ भी मिलने लगा है।

Bijapur: 21 साल बाद फिर गूंजी बच्चों की आवाज: पीड़िया में बदलाव की सबसे बड़ी निशानी यहां का स्कूल है। यह विद्यालय लगभग 21 वर्षों तक बंद पड़ा था। नक्सल प्रभाव के कारण यहां पढ़ाई ठप हो गई थी। लेकिन अब स्कूल फिर से शुरू हो चुका है और यहां 84 बच्चे नियमित पढ़ाई कर रहे हैं। कक्षा में बैठे बच्चों की आवाज इस बात का सबूत है कि पीड़िया का भविष्य अब किताबों और कलम से तय होगा, न कि बंदूक से।

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प्रशासन का मानना है कि शिक्षा और पहचान ही किसी गांव को स्थायी रूप से मुख्यधारा से जोड़ सकती है और पीड़िया में दोनों की शुरुआत हो चुकी है।

Bijapur: आखिरी छोर तक पहुंच रही सरकार: पीड़िया में लगा यह आधार शिविर इस बात का प्रतीक है कि अब शासन की सेवाएं उन इलाकों तक भी पहुंच रही हैं जो लंबे समय तक नक्सलवाद के कारण उपेक्षित रहे। पहचान से अधिकार और अधिकार से विकास तक की यह यात्रा आज बीजापुर के इस सुदूर गांव में साफ दिखाई दे रही है।

FAQ: 

सवाल 1: पीड़िया गांव की क्या पहचान थी?

जवाब: बीजापुर जिले का पीड़िया गांव कभी नक्सलवाद का गढ़ और नक्सलियों की “यूनिवर्सिटी” के रूप में कुख्यात था। सुरक्षा कारणों से यहां प्रशासन की पहुंच नहीं थी।

सवाल 2: अब गांव में क्या बदलाव आया है?

जवाब: 31 मार्च 2026 के बाद कच्चे मार्ग बनने और हालात सुधरने से प्रशासन की पहुंच संभव हुई। गांव में स्कूल फिर से खुला और पहली बार आधार शिविर लगा।

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सवाल 3: आधार शिविर में क्या हुआ?

जवाब: ग्राम पंचायत पीड़िया में विशेष आधार नामांकन शिविर लगा। इसमें 80 ग्रामीणों का नया पंजीयन और अद्यतन कार्य किया गया ताकि वे सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकें।